सफर जारी है,(आत्मकथात्मक संस्मरण, प्रो बीना शर्मा )


भारतीय संस्कृति, भाषा और मूल्यों को लेकर निरन्तर जागरुक क़रतीं हैं हम सभी को प्रोफेसर बीना दी। लोक रंग, रीति रिवाज को किस सहजता के साथ निभाया जाए आज के जीवन मे इन सब बातों को रोचक ढंग से जागरुक करते सौ लघु लेख हैं। लिखने की शैली इतनी सरल और प्रवाहवान की पूरी किताब पढ़कर ही आप उठेंगे। कुछ शीर्षक देखें, किस मिट्टी की बनी हो छोरियों, ठोकर और मंजिल,लक्ष्य मिले सुख होय,रघुनाथ जी जाने,मांगे दिया न देत,खो जाना रिश्तों का,सांची कह रई,नाय मानेगो दारी के, बाकी बस सपने होते हैं,तोरा मन दर्पण कहलाए,देहरी है सुख दुख का द्वार। ऐसे रोचक ढंग से लिखे यह किस्से हमे कभी भाव विभोर करते बचपन मे ले जाते हैं तो कभी हमे गुदगुदाते हैं। जो नवः लेखक हैं उनके लिए एक टेक्स्ट बुक सी है यह किताब की किस तरह अपने अनुभवों और रिश्तों को रोचक ढंग से बुना जाए।
( अनिल प्रकाशन,दिल्ली,) 
डॉ संदीप अवस्थी

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