रामकृपा महायज्ञ अयोध्या धाम में 02 से 10 अप्रैल 2022 तक, राष्ट्रीय संत श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर स्वामी श्री इंद्रदेव सरस्वती महाराज की दिव्य वाणी सुनने का मिलेगा अवसर

 


अयोध्या धाम -रामनवमी महोत्सव- 02 से 10 अप्रैल 2022 नौ दिवसीय 108 श्री रामकथा, पोथी पारायाण व रामकृपा महायज्ञ   की तैयारी से पूर्व राजधानी  लखनऊ आये

राष्ट्रीय संत श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर स्वामी श्री इंद्रदेव सरस्वती महाराज ने कहा मंदिर जाना, पूजा पाठ करना, तिलक लगाना, यह धर्म नहीं। धर्म तो वह कर्म है जिससे कि किसी भूखे का पेट भरता हो, किसी दुखी बीमार की सहायता हो, जिससे हमारा कोई संबंध नहीं उसके लिए भी निस्वार्थ भाव से सेवा कर दी जाए यही धर्म है। भूखों का पेट भरना दिन दुखियों की सेवा करना ही सच्ची पूजा है।

स्वामी जी ने कहा जब बच्चे घर में सोते नहीं तो उनको,  घर के बड़े बुजुर्ग, दादा-दादी कहानी सुनाते हैं तो बच्चे सो जाते हैं, भागवत को कहानी न समझे जिसे सुनाकर लोगों को सुलाया जाए - यह तो बहुत सुंदर माध्यम है। जिससे लोगों में जागृति लाकर उच्च आदर्शों की स्थापना की जा सकती है। चाहे कितना धन वैभव कमा लो यह जीवन और शरीर तो एक दिन सभी का छूटने ही वाला है,  यदि संसार में कुछ रह सकता है तो हमारे कर्मों के द्वारा हमारा नाम। कहा हमें भी निष्काम भाव से कर्म करते हुए जन कल्याण के लिए गौ सेवा, ब्राह्मण सेवा, दीन दुखियों की सेवा व अनाथ लोगों की सेवा करते हुए राष्ट्रहित में भी चिंतन करना चाहिए।स्वामी जी ने कहा  कि ब्रह्मा ने पांच हजार वर्ष तक तप किए थे तब मनु महाराज का जन्म हुआ। उसके बाद ही मनु महाराज ने मनुष्य को जन्म दिया। इसलिए आज के जगत में जितने भी मनुष्य हैं, सभी मनु जाति के हैं। संसार में बुद्धिजीवियों ने मनुष्य को विभिन्न वर्गों में बांट दिया है। मनुस्मृति में सारा विश्लेषण दिया गया है। मनुष्य कैसे जन्म लिया और समय-समय पर क्या करना चाहिए का उल्लेख है।

बताया कि किसी साधु का अपमान नहीं करना चाहिए। हर जीवों की सेवा करने से मनुष्यों संकट से बचता है और अच्छे फलों की प्राप्ति होती ती है। संकट में सभी साथ छोड़ देते है। उस समय गुरुदेव ही रक्षा करते हैं


राष्ट्रीय संत श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर स्वामी श्री इंद्रदेव सरस्वती महाराज ने जी ने आज हमारे आवास पर चरण रख कर हम सभी को कृतार्थ किया, मेरी धर्म पत्नी अंजु बेटी रितिका तथा मुझे आशीर्वाद प्रदान किया।

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