मातृभाषा प्रेमी पंडित माधव राव सप्रे- 151वीं जयंती पर विशेष





हिंदी नवजागरण और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में बढ़चढ़ कर योगदान देने वाले पंडित माधव राव सप्रे का मातृभाषा प्रेम महात्मा गांधी और महावीर प्रसाद द्विवेदी से कतई कमतर नहीं था। गुलाम भारत में प्रभुत्व जमाती अंग्रेजी के खिलाफ मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर 'म' अक्षर वाले तीनों महारथी- महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे और महावीर प्रसाद द्विवेदी ही मोर्चा संभालने वाले लोगों में अग्रणी थे। यह तीनों ही महानुभाव राष्ट्रभाषा के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के महत्व पर जोर देते हुए हिंदी नवजागरण और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को अपनी-अपनी तरह से गतिशील बना रहे थे।

    1917 की 'सरस्वती' में माधव राव सप्रे का एक लेख छपा था-'राष्ट्रीयता की हानि का कारण'। इस लेख में उन्होंने कहा-'अंग्रेजी भाषा के अधिक प्रचार और देशी भाषाओं के अनादर से राष्ट्रीयता की जो हानि हो रही है, उसका पूरा पूरा वर्णन करना कठिन है। जब तक अंग्रेजी भाषा का अनावश्यक महत्व न घटाया जाएगा और जब तक शिक्षा का द्वार देशी भाषाओं को बनाकर वर्तमान शिक्षा पद्धति में उचित परिवर्तन न किया जाएगा, तब तक ऊपर लिखी गई बुराइयों से हमारा छुटकारा नहीं हो सकता।'

   इसी एक में उनका कथन है-'किसी समय रूस में उच्च वैज्ञानिक शिक्षा जर्मन और फ्रेंच भाषाओं के द्वारा दी जाती थी परंतु अब वहां यह बात नहीं है। सन् 1880 ईस्वी में एक प्रोफेसर ने रूसी भाषा में वैज्ञानिक शिक्षा देना आरंभ किया। दूसरे प्रोफेसरों ने भी उसका अनुकरण किया। फल यह हुआ कि अब रूसी भाषा बोलने वाले रूस के समस्त प्रांतों में वैज्ञानिक शिक्षा रूसी भाषा ही के द्वारा दी जा रही है।' अपने उसी लेख में सप्रे जी यह भी लिखते हैं-'जापान के विश्वविद्यालयों का भी यही हाल है। वहां कठिन से कठिन और गहन से गहन तत्वपूर्ण विषयों पर व्याख्यान जापानी भाषा में ही होते हैं। जापानी भाषा का साहित्य थोड़े समय पहले ऐसा था कि उसकी तुलना भारतीय देशी भाषाओं के साहित्य से करना उसको सम्मान देना कहा जा सकता है। ऐसी अवस्था में भारतवासी ही अपनी मातृभाषा में शिक्षा पाने से वंचित क्यों रहें?

   अपने इस लेख में वह राष्ट्रभाषा और भारतीय भाषा के सवाल को इस तरह भी रेखांकित करते हुए आलोचनात्मक जस्ट भ डालते हैं-'संसार के अग्रगण्य वैज्ञानिकों में भारतवर्ष के सुप्रसिद्ध अध्यापक जगदीश चंद्र बसु भी हैं। वे अपने सभी आविष्कारों का वर्णन अंग्रेजी भाषा में करते हैं और ग्रंथ लेखन भी उसी भाषा में यदि वे बंगला भाषा का उपयोग करने लगे तो देशी भाषाओं में वैज्ञानिक ग्रंथों का आंशिक अभाव दूर हो सकता है।' सप्रे जी केवल राष्ट्रभाषा और भारतीय भाषाओं के महत्व पर ही जोर नहीं दे रहे थे। अपने समकालीन और अपनी से आगे की पीढ़ी के महत्वपूर्ण लोगों को यह आईना भी दिखा रहे थे कि मातृभाषा को महत्व देना देश की उन्नति, राष्ट्र की एकता, भारत और भारतीय भाषाओं को गुलामी की दास्तां से मुक्ति दिलाने का एकमात्र माध्यम मातृभाषा ही है।

   महात्मा गांधी का मातृभाषा और राष्ट्रभाषा प्रेम जगजाहिर ही है। गांधीजी भारतीय भाषाओं के व्यवहार के प्रबल समर्थक थे। उन्हें हिंदी बोलने पर ही नहीं गुजराती का व्यवहार करने पर भी धक्के खाने पड़े थे। राष्ट्रभाषा और मातृभाषा को महात्मा गांधी देशोद्धार और देशोन्नति का प्रधान साधन समझते थे। दक्षिण अफ्रीका की जेल में बंद रहते समय महात्मा गांधी को अपनी पत्नी की बीमारी का तार मिलने का किस्सा सबको पता ही है। महात्मा गांधी यदि जुर्माना अदा कर देते तो उन्हें जेल से छुटकारा मिल जाता और वे अपने घर जाकर अपनी पत्नी की सेवा आदि कर सकते थे पर उन्होंने अपने सिद्धांत से समझौता नहीं किया। जेलर की आज्ञा प्राप्त करके अपनी पत्नी को उन्होंने गुजराती में एक पत्र लिखा। पत्र देखकर जेलर चौंक गया, क्योंकि वह उसे पढ़ न सका। जेलर ने उस पत्र को तो जाने दिया पर आज्ञा दी कि गांधीजी अपने अगले पत्र अंग्रेजी में ही लिखेंगे। गांधी जी ने उस जेलर से कहा-' मेरे हाथ के गुजराती पत्र इस बीमारी की दशा में मेरी पत्नी के लिए दवा का काम करेंगे। इस कारण आप मुझे गुजराती में ही लिखने की आज्ञा दीजिए' पर जेलर नहीं माना और फल यह हुआ कि गांधी जी ने अंग्रेजी में लिखने से इंकार कर दिया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ऐसे दृढ़ प्रतिज्ञ और मातृभाषा भक्त महात्मा गांधी को इंदौर के आठवें हिंदी साहित्य सम्मेलन का सभापति बनाए जाने की भी प्रशंसा की थी।

    महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती के माध्यम से मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के सवाल पर खुद तो लिख ही रहे थे और दूसरे लेखकों के लेख भी प्रमुखता से छपते हुए अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई को अपने ढंग और सरस्वती के मालिकों की रीति-नीति पर खरा उतरते हुए नई ताकत दे रहे थे। द्विवेदी जी ने बहुतसंख्यक जनता को शिक्षित करने की नीति अपनाई थी। उनका स्पष्ट मानना था कि विभिन्न प्रदेशों की जनता अपनी-अपनी मातृभाषाओं के माध्यम से ही शिक्षित हो सकती थी। द्विवेदी जी ने कहा कि शिक्षित होने का अर्थ अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है। वे लगातार सवाल उठा रहे थे-'अच्छा शिक्षा के मानी क्या? अंग्रेजी भाषा में धड़ल्ले के साथ बोलना और लिखना आ जाना ही क्या शिक्षा है? द्विवेदी जी ने लिखा था-'30 करोड़ भारतवासियों की ज्ञान वृद्धि क्या इन अंग्रेजी के मुट्ठी भर शुद्ध लेखकों से हो जाएगी?' अंग्रेजी राज से निराश होकर उन्होंने लिखा-'लक्षणों से तो यही मालूम होता है कि घर के धान भी पयाल में जाना चाहते हैं। इस दशा में जब तक हम लोग स्वयं ही अपने उद्योग से अपने स्कूल खोल कर अपने मन की शिक्षा न देंगे तब तक यथेष्ट उद्धार की आशा नहीं है।'

   पंडित माधव राव सप्रे की आज 151वीं जयंती है। जयंती पर हम मराठी भाषी सप्रे जी के मातृभाषा और राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए दिए गए योगदान को याद रखने नई पीढ़ी को याद दिलाना महत्वपूर्ण है। उनके उठाए हुए कदम 100 साल पहले भी प्रासंगिक थे और आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक ही बने हुए हैं।




∆ गौरव अवस्थी

    रायबरेली/उन्नाव

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