'नॉस्टैल्जिया' चित्र श्रृंखला की प्रदर्शनी - 02 – 05 जुलाई कला स्रोत आर्ट गैलरी, लखनऊ में होगा आयोजन




श्रीमती मानसी डिडवानिया और श्री अनुराग डिडवानिया क्यूरेटर और वरिष्ठ कलाकार अवधेश मिश्र होंगे मुख्य अतिथि 



प्रदशनी में दिखेगा बचपन और गंवई जन जीवन  


सुमित कुमार की

'नॉस्टैल्जिया' चित्र श्रृंखला





'नॉस्टैल्जिया' के अर्थ और सरोकार व्यापक हैं। जिए हुए समय और मनोदशा में बारम्बार लौटना नॉस्टैल्जिया है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का एक महत्वपूर्ण समय होता है बालपन और किशोरवय, जहाँ दुनिया देखने की जिज्ञासा और वहाँ स्वयं की उपस्थिति का बहुविधि प्रयास होता है। इसके साथ अपनी स्वाभाविक गतिविधियों और परिवेश से जुडी संवेदनाओं और स्मृतियों का पिटारा लेकर व्यक्ति अपना वजूद गढ़ता है। ये अनुभूतियों और स्मृतियाँ अविस्मरणीय होती हैं जहाँ व्यक्ति बार-बार जाना और उसे जीना चाहता है। ये अनुभव व्यक्ति के जीवन में परिस्थितिवश आयी नकारात्मकता और अवसाद को तो कम करते ही हैं, उसे रचनात्मक बनाते हैं, आगे बढ़ने का रास्ता दिखाते हैं और अदम्य इच्छाशक्ति के साथ ही एक अक्षुण ऊर्जा भी देते हैं। 


ये अविस्मरणीय पल और अनुभूतियाँ अनेक रचनाकारों की कालजयी रचनाओं का विषय-वस्तु बनी हैं। बालपन और किशोरवय की जिज्ञासाओं और अनुभूतियों नें रचनाओं को जीवन्त किया है। अनेक रचनाकारों ने इससे न कि स्वयं की रचनात्मक धार तेज की है बल्कि रचना प्रेमियों को भी कुछ समय के लिए ही सही, ऐसे भाव और समय में ले जाकर खड़ा किया है, जिसे वह जीवन की आपाधापी में पीछे छोड़ आए थे। सुमित कुमार एक संवेदनशील युवा कलाकार हैं। वह अपने परिवेश, परम्पराओं, अग्रजों द्वारा दिखाए गये आदर्शों और जीवन मूल्यों के साथ जीवन जीने की ललक रखते हैं। वह अपनी कला-दीक्षा पूरी कर अब व्यावहारिक जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। उनकी यह पहली एकल कला प्रदर्शनी उनके जीवन और रचनात्मक यात्रा के नए द्वार खोलेगी।

 

सुमित ने बचपन और किशोरवय में गाँव का जीवन जिया है। गवईं जन-जीवन और क्रियाकलाप में पूरे उत्साह से भागीदारी की है- खेती-बाड़ी, मचान-खलिहान, मेले-ठेले, बालसखाओं के साथ उछल-कूद और शरारतों का भरपूर आनंद लिया है, पर अब वह संजीदा हो गये हैं, छूटते जा रहे को पकड़ना चाहते हैं, फिर से जीना चाहते हैं दूर तक फैले दृश्यों – पेड़-पहाड़ और पशु-पक्षियों के संगीत को। गुनगुनाना चाहते हैं वही 'बालराग' बालसखाओं के साथ। तभी तो रचने लगे हैं 'नॉस्टैल्जिया' जिनमें वह रंग भी भर सकें जो छूट गया था। सुमित ने 'नॉस्टैल्जिया' को बहुविधि चित्रित किया है, जहाँ स्कूल से बंक मारते बच्चे हैं, टीवी का एंटीना ठीक कर रामायण और महाभारत सीरियल देखते बच्चे हैं, रेडियो पर सदाबहार गाने सुनते बुज़ुर्ग दंपत्ति हैं तो पड़ोसी की बाग़ से आम तोड़ते के लिए दोस्त की पीठ पर बैठे बच्चे हैं, भैंस की पीठ पर बैठकर चरवाही करते बच्चे, एक दूसरे को उछालते बच्चे, काठ के घोड़े पर या रेलगाड़ी बनाकर एक दूसरे के पीछे बैठे कई बच्चे, मेले में पिपिहरी बजाते और लट्टू खेलते बच्चे, खटिया बीनता गृहस्थ, साइकिल पर सामान लेकर जाते आदमी के साथ आगे बैठा छोटा बच्चा, बाइसकोप, गुब्बारे और आइसक्रीम वाला, जुगुनू और तितली पकड़ते बच्चे, कैंची-साइकिल चलाता बच्चा जिसके कैरियर पर उकुडूं बैठा दूसरा बच्चा, हैंडपंप के नीचे नहाता बच्चा ..... और भी ऐसे न जाने कितने खुशी देने वाले बचपन में जिए गये विषय जो हम पीछे छोड़ आये हैं। 


सुमित एक रचनात्मक, उत्साही और ऊर्जावान युवा कलाकार हैं जिन्होंने समय की नब्ज को पकड़ा है। अपनी प्रस्तुति की नवीनता और मौलिकता के कारण कला प्रेमियों और कलासंग्राहकों की नज़र में आए हैं। अपनी कृतियों में इन्होनें सतरों के पीछे कई परतों में इबारत लिखी है जो कला के जानकारों में एक उत्सुकता पैदा करती है। 'नॉस्टैल्जिया' श्रृंखला के गूढ़ार्थ समेटे विषय तो रुचिकर हैं ही, विभिन्न माध्यमों के दक्षतापूर्ण प्रयोग और सतरों के पीछे जाते विषयों की धूमिल होती स्मृतियों को कुरेदना और मन को गुदगुदाना महत्त्वपूर्ण है।  


डॉ लीना मिश्र 

कला समीक्षक / सह-संपादक 'कला दीर्घा'  

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