उपेक्षित न रखा जाये देवगढ़ की प्रख्यात धरोहर



पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर किया जाये विकास कार्य
जाखलौन। जनपद ललितपुर के सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में से एक देवगढ़ अपनी उपेक्षा का शिकार होकर गुप्त काल का महत्वपूर्ण साक्षी होने के बाद भी अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। इसके नजदीक स्थित चांदपुर का प्राचीन तालाब और जंगल में मूर्तिकला के नायाब नमूने जो आज भी पर्यटकों को बरबस आकर्षित कर लेते हैं। उपेक्षा का शिकार होकर ना तो पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं और ना ही उनका पर्याप्त संरक्षण हो पा रहा है।

पूरे विश्व में मशहूर गुप्त काल के स्वर्णिम काल का साक्षी दशावतार मंदिर आज अपनी उपेक्षा, मूर्तियां का देखरेख के अभाव में क्षरण होना शुरू हो गई है। यदि ठीक से इनका रखरखाव नहीं किया गया तो इन के नष्ट होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। बताते चलें दशावतार मंदिर परिसर में संग्रहालय भी बना हुआ है जिसमें प्राचीन मूर्ति कला की अद्भुत मूर्तियां संग्रहालय में संरक्षित करके रखी गई हैं। परंतु दर्शकों के लिए इस संग्रहालय को कभी नहीं खोला जाता।



 यद्यपि पर्यटकों को जाने के लिए 25 का टिकट लेना पड़ता है, परंतु उन्हें संग्रहालय नहीं खोला जाता। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी छिपे हुए एजेंडे के अंतर्गत इन मूर्तियों को तालों में बंद कर दिया गया है। ताकि पर्यटक आकर्षित न हो और इस क्षेत्र को विकास से वंचित रखा जा सके। इस संबंध में जब पुरातत्व के अधिकारियों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि उच्च अधिकारियों के आदेश से इसे हमेशा बंद रखा जाता है।जबकि यहां सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस चौकी भी बनाई गई है। देवगढ़ को पर्यटन से जोडऩे के लिए यहां पर यातायात के कोई साधन उपलब्ध नहीं है।

इस क्षेत्र में न तो गाइड की व्यवस्था है और न ही पर्यटकों के सुरक्षा स्वास्थ्य की कोई व्यवस्था। इस क्षेत्र की जानकारी देने के लिए कोई भी जानकारी देने वाला यहां नहीं रहता है ।और न ही यहां किसी तरह का ऐसा साहित्य रखा जाता है जिसके माध्यम से पर्यटन क्षेत्र की विस्तार से जानकारी मिल सके। वाहन कनेक्टिविटी न होने के कारण इस क्षेत्र में आने वाले पर्यटक बहुत परेशान हो जाते हैं। 

रोडवेज की एक बस जो लखनऊ से देवगढ़ तक संचालित की जाती थी उसे भी प्राइवेट बस ऑपरेटरों ने बंद करवा दिया है। बताते चलें कि यदि देवगढ़ को पुरातत्व और पर्यटन विभाग संयुक्त रूप से मिलकर विकसित करने का प्रयास करें तो इस क्षेत्र को विश्व पर्यटन मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान मिल सकता है ।क्योंकि यहां पर हिंदू ,जैन, बौद्ध संस्कृति के प्राचीन मंदिर और मूर्तियों की विशाल श्रृंखला विद्यमान है। देवगढ़ किले की जैन मूर्तियों और मंदिरों की श्रंखला से जोड़कर  बेतवा नदी के मध्य स्थित टापू पर रोप वे के माध्यम से एक कैफेटेरिया विकसित कर दिया जाए और इस स्थान से मोटर बोट और पेडलबोट ब के माध्यम से पर्यटकों को रणछोड़ धाम मंदिर ,जाखलौन पंप कैनाल है और राजघाट से जोड़ दिया जाए तो पर्यटकों की भारी संख्या क्षेत्र में आना प्रारंभ हो जाएगी। इसी प्रकार पर्यटन परिपथ के रूप में इसे पाली के नीलकंठेश्वर मंदिर, दूधई के नरसिंह मंदिर और प्राचीन जैन मंदिर चंदेरी को राजघाट से जोड़ दिया जाए तो चंदेरी के प्राचीन स्मारकों ऐतिहासिक स्थलों को जोड़कर एक सघन परिपथ का निर्माण किया जा सकता है ।इसी प्रकार चांदपुर में एक प्राचीन तालाब है जो कुछ दशकों पूर्व तक एक विकसित तालाब था ,जिसके माध्यम से स्थानीय किसानों जंगली, घरेलू जानवरों पशु पक्षियों और गांव के लोगों को पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध रहता था परंतु खनिज माफियाओं के द्वारा इस तालाब के अंदर खनन कार्य कर इसके अस्तित्व को समाप्त कर दिया गया है । इसी कारण आज इस क्षेत्र में पानी की गंभीर समस्या बनी हुई है। अगर इस तालाब को पुनः विकसित कर दिया जाए तो इस क्षेत्र की पानी की समस्या का समाधान किया जा सकता है तथा तेजी से गिरते हुए जल स्तर को रोका जा सकता है ।और यहां के जंगली जानवरों को पानी की पर्याप्त व्यवस्था हो सकती है। जाखलौन रेलवे स्टेशन पर पहले पांच ट्रेनों का स्टॉपेज था कोरोना काल में बंद होने के बाद अब इसे स्थगित कर दिया गया है जिसके चलते यहां पर्यटक का आना जाना लगभग बंद हो चुका है । यदि देवगढ़ को पर्यटन व्यवसाय के रूप में विकसित कर दिया जाए तो इससे ऑटो टैक्सी चालकों और पर्यटन आधारित व्यवसायों को बढ़ाया जा सकता है । जिससे क्षेत्र के युवाओं को रोजगार भी मिलेगा और यहां के उपेक्षित पर्यटन क्षेत्र विकसित होंगे। इस संबंध में एक प्रतिनिधिमंडल ने क्षेत्रीय सांसद अनुराग शर्मा को प्रत्यावेदन देकर क्षेत्र के विकास की मांग उठाई है।

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