‘प्राचीन भारतीय लेखन कला के प्रेरक संदर्भ’’ विषय पर प्रो0 शैलेन्द्र नाथ कपूर, पूर्व विभागाध्यक्ष, लखनऊ विश्वविद्यालय, द्वारा पावर प्वाइन्ट के माध्यम से रूचिकर व्याख्यान



लखनऊ,राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा आयोजित ‘‘कला अभिरूचि पाठ्यक्रम’’ की श्रृंखला के अन्तर्गत आज दिनांक 10 दिसम्बर, 2022 को ‘‘प्राचीन भारतीय लेखन कला के प्रेरक संदर्भ’’ विषय पर मुख्य वक्ता प्रो0 शैलेन्द्र नाथ कपूर, पूर्व विभागाध्यक्ष, प्रा0भा0इ0 एवं पुरातत्व, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ द्वारा पावर प्वाइन्ट के माध्यम से रूचिकर व्याख्यान दिया गया। इस अवसर पर निदेशक, राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा पुष्प गुच्छ भेंट कर वक्ता का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन कर रही डॉ0 मीनाक्षी खेमका द्वारा प्रो0 शैलेन्द्र नाथ कपूर के कार्यो पर प्रकाश डालते हुए श्रोतागणों को परिचय कराते हुए कहां कि लेखन कला के संदर्भ में प्राचीन सभ्यता को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

विद्वान वक्ता द्वारा बताया गया कि विचारों को लिपिबद्ध करने की कला लेखन कला कहलाती है। लेखन कला में लिपियों का आरम्भ चित्रों, संकेतों तथा भाव संकेतों से हुआ। भारत की प्राचीनतम सिन्धु सभ्यता का सम्पर्क वर्तमान ईरान की तत्कालीन सुमेरिया एवं बेबीलोनिया (मेसोपोटामिया) तथा मिस्त्र की सभ्यताओं से था। सिन्धु सभ्यता में उत्खनन के परिणाम स्वरूप दो हजार से अधिक मुहरें मिल चुकी है। इन पर लिपि, संकेत, पशु-पक्षी की आकृतियॉं उकेरी गई है। ईराक में मिट्टी के फलको पर नुकीली कलम से लिपि संकेत उकेरे जाते थे फिर इन फलको को सुखाया जाता था। फलकों पर अंकित ये अक्षर कील के आकार के दिखायी देते थे। मिस्त्र की प्राचीन लिपि चित्र-संकेत (हाइरोग्लिफिक) कहलाती है। बाद में इसी लिपि के एक रूप को ‘‘देमोतिक’’ नाम दिया गया। ज्ञान अर्जित करने में लिपि का ज्ञान आवश्यक है जो पुस्तकों के रूप में हमारा मार्ग दर्शन करती है। भारतीय कला में देवी-देवताओं के माध्यम से  लिपि की प्रतिष्ठा को कलाकृतियो में प्रदर्शित किया गया है। प्राचीन भारतीय अभिलेखों में उत्कीर्ण अनेक प्रेरक सन्दर्भों में से कुछ सन्दर्भ यहॉं प्रस्तुत हैः- प्रारम्भ में भोजपत्र व ताड़पत्र पर लेखन होता था।  तीसरी शती पूर्व के र्मार्य वंशी शासक अशोक द्वारा पत्थर की शिलाओं तथा स्तम्भों पर तत्कालीन प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में भारत के विभिन्न अंचलों में छेनी एवं हथौड़ी के द्वारा लेख उत्कीर्ण कराए गए है। भारत की प्राचीन ब्राह्मी लिपि को सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप ने 1834 से 1837 ई0 के बीच में पढ़ा था। इससे उन्हें संस्कृत भाषा  के अध्ययन में ही सफलता मिल पायी।

कार्यक्रम के अन्त में संग्रहालय के निदेशक डॉ0 आनन्द कुमार सिंह ने वक्ता को धन्यवाद ज्ञापित करते हुये प्रश्नगत विषय के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ज्ञान मनुष्य को सभ्य बनाता है जिसके लिए हमें लिपि का ज्ञान आवश्यक है एवं प्रो0 एस0एन0 कपूर ने भारत की प्राचीन लेखन कला की महत्ता को अत्यन्त ही सहज ढंग से प्रस्तुत किया गया जो पुरातत्व के विद्यार्थियों के लिए लाभप्रद होग। इस अवसर पर रेनू द्विवेदी, डॉ0 मीनाक्षी खेमका, सुश्री अलशाज फातमी, डॉ0 विनय कुमार सिंह, डॉ0 कृष्ण ओम सिंह, तृप्ति राय शारदा प्रसाद त्रिपाठी, डॉ0 अनिता चौरसिया, धनन्जय कुमार राय, प्रमोद कुमार सिंह, शालिनी श्रीवास्तव, अनुपमा सिंह, गायत्री गुप्ता, नीना मिश्रा, बृजेश यादव, सुरेश कुमार, सत्यपाल एवं परवेज़ आदि उपस्थित रहे। 


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