उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान द्वारा "भारतीय भाषा महोत्सव" के सुअवसर पर "हिंदी भाषा में बाल साहित्य" विषयक संगोष्ठी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान द्वारा "भारतीय भाषा महोत्सव" के सुअवसर पर आज आयोजित "हिंदी भाषा में बाल साहित्य" विषयक संगोष्ठी ने बाल साहित्य के विकास एवं साहित्यिक प्रभाव के मुद्दे पर गहरा प्रभाव डाला। इस संगोष्ठी ने बाल साहित्य के समृद्धि एवं उसके साहित्य को बढ़ावा देने का माध्यम प्रदान किया, जिससे भाषा की स्थिति में सुधार किया जा सके। साथ ही, इस संगोष्ठी ने बाल साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर गहरा अध्ययन किया और शोध कार्यों का प्रचार-प्रसार किया। संस्थान के निदेशक विनय श्रीवास्तव ने विशेष रूप से, बाल साहित्य में होने वाले परिवर्तनों को समझने एवं विश्लेषण करने के माध्यम सभिबके समक्ष रखे एवं बाल साहित्य के प्रमुख लेखकों, कवियों और उनके रचनाओं के साथ मुलाकातें करके उनके योगदान को और अधिक समझने के लिए प्रयास करना चाहिए, ऐसा कहा जिससे बाल साहित्य को विस्तृत रूप से सबसे साझा किया जा सके।
इस संगोष्ठी का एक और महत्वपूर्ण पहलु यह रहा कि इसमें प्राचीन बाल साहित्य से लेकर आधुनिक अवस्था तक के सभी पहलुओं पर चर्चा की गई, जिससे भाषा के समृद्धिशील विकास की समझ में मदद मिली। उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान ने बाल साहित्य के विकास एवं साहित्यिक विरासत को सुरक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाये, जिससे यह मौन भूमि फिर से अपनी साहित्यिक महत्ता को पुनर्निर्माण कर सकती है। आमंत्रित बाल साहित्यकार सुश्री सुषमा गुप्ता, श्रीमती नीलम राकेश, श्री अखिलेश त्रिवेदी शास्वत, डा रश्मि शील, प्रो सुनील वर्मा, डॉ विवेक अग्रवाल, प्रो रामकृष्ण शुक्ल, प्रो बलराज सिंह एवं डॉ शीला पांडेय ने संगोष्ठी में अपने विषय पर व्याख्यान देते हुए बाल साहित्य के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला। श्रीमती नीलम राकेश ने बाल साहित्य के विकास में समर्थन के साथ-साथ इसके भाषाई और साहित्यिक महत्त्व को बढ़ावा देने के लिए अपने विचार प्रस्तुत किए। श्री अखिलेश त्रिवेदी ने बाल साहित्य के इतिहास, विकास, और वर्तमान स्थिति पर अपने व्याख्यान में गहराई से जाकर इसे विश्लेषण किया।
प्रो सुनील वर्मा ने संगोष्ठी में बाल साहित्य के साहित्यिक उत्थान के लिए समर्थन और सुझाव प्रस्तुत करते हुए उसके साहित्यिक पूर्वगामी और आधुनिक पहलुओं का मुद्दा उठाया। प्रो रामकृष्ण शुक्ल ने अपने व्याख्यान में बाल साहित्य में परिवर्तनों को उजागर करके उसकी समृद्धि में कैसे योगदान किया जा सकता है, यह प्रस्तुत किया। डॉ शीला पांडेय ने संगोष्ठी में हिंदी भाषा में बाल साहित्य में रस, भावना, और सौंदर्य के पहलुओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए और इसे साहित्यिक दृष्टिकोण से विश्लेषण किया। कार्यक्रम में विविध सामाजिक विभूतियां, गणमान्य विद्वत, शोधार्थी, संस्थान से दिनेश कुमार मिश्र, अंजू सिंह, प्रियंका, आशीष, हर्ष, ब्रजेश यादव, रामहेत पाल, शशि, छाया आदि उपस्थित रहे।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?

कर्नाटक में विगत दिनों हुयी जघन्य जैन आचार्य हत्या पर,देश के नेताओं से आव्हान,