नाम बदले, रामायणकालीन पहचान नहीं




त्रेतायुग में श्रीराम ने वनवास के 12 बरस छत्तीसगढ़ में बिताए । जिन प्राचीन पर्वत-नदियों और जंगलों को पार करते हुए वे गुजरे, उनका नाम तब कुछ और था। आज किन्हीं और नामों से जाना जाता है। जैसे आज की महानदी तब चित्रोत्पला गंगा कहलाती थी। सुकमत आज का सिहावा पर्वत है। दो युग बीतने के बाद भी नहीं बदली तो इनकी रामायणकालीन पहचान श्रीराम से जुड़े स्मरण यहां आज भी जीवंत है। लोक आस्था से जगमग इन जगहों की परंपराएं और मान्यताएं भी दिलचस्प हैं। यही वजह! है कि छत्तीसगढ़ियों के लिए इन स्थानों का महत्व अयोध्या से कम नहीं। सीता ने जिस नदी पर रेत से शिवलिंग बनाकर कभी महादेव को पूजा था, वहां से गुजरते वक्त अब भी लोगों के सिर श्रद्धा से झुक जाते हैं। श्रीराम की सप्त ऋषियों से मुलाकात की अनुभूति करने लोग गाहे-बगाहे पहाड़ियों का रूख करते हैं। हमर भांचा राम के दूसरे भाग में ऐसी ही रोचक बातें....



सीता माता ने पूजा की जो परंपरा डाली थी, वो आज तक कायम है।

त्रेतायुग में महानदी चित्रोत्पला गंगा कहलाती थीं। सोमेश्वरदेव के महुदा ताम्रपत्र में भी महानदी को चित्रोत्पला-गंगा कहा गया है। लोक मान्यताओं के अनुसार वनवास काल के दौरान माता सीता ने यहां रेत का शिवलिंग बनाकर पूजा की थी। इसे ही परंपरा बनाकर लोग सदियों तक यहां शिवजी की पूजा करते रहे। आठवीं सदी में नदी के बीचोबीच मंदिर का निर्माण करवाया गया। इस रास्ते से गुजरते वक्त लोगों के सिर आज भी श्रद्धा से सिर्फ इसलिए झुक जाते हैं क्योंकि कभी माता सीता ने यहां पूजा की थी।



रामायणकाल में इतने ऋषियों

1. वशिष्ठ आश्रम 2. जमदग्नि आश्रम 3. विश्रवा आश्रम 4. मांडव्य आश्रम 5. लोमस ऋषि आश्रम

6. सुतीक्ष्ण आश्रम

7. भृगु आश्रम

8. मुचकुंद आश्रम 9. श्रृंगी आश्रम 10. अगत्स्य आश्रम

11. अंगिरा आश्रम 12. शभरंग आश्रम 13. वाल्मीकि आश्रम 14. कंक ऋषि आश्रम



अलग-अलग पहाड़ियों पर 7 ऋषियों के आश्रम,

 आज हम जिसे सिहावा पर्वत के नाम जानते हैं. रामायण के समय उसे सुकमत पर्वत के नाम से जाना जाता था। यहां अलग-अलग पहाड़ियां जिन पर सप्त ऋषियों के आश्रम हैं। इनमें मुचकुंद, अगस्त्य, अंगिरा, श्रृंगि, कर्क, शरभंग और गौतम ऋषि शामिल हैं। वनवासकाल के दौरान श्रीराम ने यहां सप्तऋषियों से भेंट की थी। दंडकारण्य में असुरों के नाश के लिए ऋषियों से चर्चा का जिक्र भी ग्रंथों में मिलता है। यह स्थान धमतरी जिले से 80

किलोमीटर दूर है। राज्य सरकार श्रीराम वनगमन पर्यटन परिपथ के तहत इस इलाके का सौंदर्यीकरण और विकास करवा रही है। रतनपुर कहलाता था रत्नगिरी राम ने शबरी से की मुलाकातः आज का रतनपुर तब रत्नागिरी कहलाता था। केदारनाथ ठाकुर द्वारा 1908 में लिखी गई किताब बस्तर भूषण के अनुसार, श्रीराम मध्यप्रदेश के चित्रकोट से सतना, शहडोल, अमरकंटक होते हुए रत्नागिरी (रतनपुर) होते हुए दक्षिण

के आश्रम थे पश्चिम की ओर निकल गए थे। मान्यता है कि श्रीराम ने इसी दौरान शिवरीनारायण में शबरी के जूठे बेर खाए थे। इस किदवंती को पुष्ट करता यहां बरगद का एक प्राचीन पेड़ भी खड़ा है। माना शबरी ने इसी पेड़ के पत्तों से दोना बनाकर श्रीराम को बेर दिए थे। अब इस पेड़ में पत्ते ही दोने की तरह उगते हैं।


श्री राम ने 12 चौमासे छत्तीसगढ़ में ही बिताए जानिए कहां.....

1. छतौड़ा आश्रम,

कोरिया

2. रामगढ़, सरगुजा

3. किलकिला, जशपुर

4. शिवरीनारायण, जांजगीर

5. पचराही, कबीरधाम

6. राजिम गरियाबंद

7. सिहावा, धमतरी

8. मानपुर, राजनांदगांव

9. नारायणपुर

10. चित्रकोट बस्तर

11. भद्रकाली, बीजापुर

12. इंजरम, सुकमा




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