बेहतरीन शेरगोई के लिए-- ज़रूरी है 'अरूज़' का ज्ञान

 बेहतरीन शेरगोई के लिए--


ज़रूरी है 'अरूज़' का ज्ञान

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'उर्दू' एक लोकप्रिय भारतीय भाषा है, जिसका निर्माण हिन्दी और फ़ारसी के परस्पर मेल-मिलाप से हुआ है। हिन्दी के प्रभाव से इसमें अनेक भारतीय भाषाओं सहित संस्कृत भाषा के भी शब्द प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। वहीं दूसरी ओर फ़ारसी के प्रभाव से इसमें फ़ारसी, अरबी, तुर्की सहित अन्य अनेक मध्य एशियाई भाषाओं के शब्द भी प्रचलित है। जहाँ एक ओर इस मधुर भाषा की लिपि, फ़ारसी लिपि है, वहीं दूसरी ओर इसके अनेक नियम क़ायदे हिन्दी से लिये गये हैं। यह भाषा भारतवर्ष में आपसी एकता और परस्पर मेल-मिलाप का आधार स्तंभ रही है। लोगों ने जहाँ इसे हिन्दी की बहन अथवा बेटी कहा है, वहीं एक शोध के फलस्वरूप इसे शौरसेनी प्राकृत की प्रपौत्री, पश्चिमी हिन्दी की पौत्री और दिल्ली-भाषा की बेटी माना गया है।


जिस प्रकार उर्दू कई भाषाओं से मिलकर बनी है, उसी प्रकार इस भाषा की कविताओं में प्रयुक्त होने वाला छन्दशास्त्र, भारतीय और मध्य एशियाई छन्दशास्त्रों से मिलकर बना है। प्रत्येक भाषा के छन्दों का निर्माण उस भाषा की प्रकृति और बनावट के अनुरूप होता है। इसी सिद्धान्त के अनुसार उर्दू छन्दशास्त्र का संयोजन भारतीय और मध्य एशियाई भाषाओं के छन्दशास्त्रों के मिलन का एक उत्कृष्ट नमूना कहा जा सकता है।


यूँ तो उर्दू-छन्दशास्त्र मूलतः अरबी छन्दशास्त्र पर आधारित है, तथापि इसमें हिन्दी के अनेक छन्दों को बड़ी सहजता से समाहित कर लिया गया है। अब इसे केवल संयोग ही कहा जाये अथवा खाड़ी के देशों से हमारे घनिष्ट संबंधों की देन, कि पिंगल (भारतीय छन्दशास्त्र) और 'अरूज़' (अरबी छन्दशास्त्र) में कुछ छन्द ऐसे हैं जो अति साधारण भेद के साथ समरूप हैं और दोनों जगह प्रचलित हैं।


अरबी छन्दशास्त्र का जनक 'ख़लील बिन अहमद' (721-787 ई.) 'बसरा' का एक प्रसिद्ध विद्वान था। इसी विद्वान की रची हुई बहरें (छन्द) यथोचित परिवर्तनों और परिवर्द्धनों के साथ फ़ारसी एवं उर्दू छन्दशास्त्र में प्रचलित हैं। ख़लील बिन अहमद ने जिन बह्रों का आविष्कार किया था बाद के विद्वानों ने उन्हीं मूल बह्रों के आधार पर बह्रों की संख्या में बढ़ोत्तरी की और ज्यों-ज्यों यह छन्दशास्त्र लोकप्रिय होता गया त्यों- त्यों इसके छन्दों की संख्या बढ़ती गई और अरबी-फ़ारसी से सज-संवरकर उर्दू में आते-आते न केवल इसके छन्दों में भारी वृद्धि हो गई, बल्कि इसमें अनेक उपयोगी नियमों-उपनियमों का संवर्द्धन भी हो गया।


आज जिसे उर्दू छन्दशास्त्र के अर्थों में 'अरूज़' कहते हैं उसमें शताधिक छन्द विद्यमान है। अरूज़ की भाषा में छन्द को 'बह्र' कहते हैं। अरूज़ में वर्णित शताधिक बह्रों में से लगभग 30-35 बह्रें ऐसी हैं जो उर्दू शाइरी में अतिप्रचलित हैं। शेष बह्रें अरबी और फ़ारसी में ही प्रयुक्त होती हैं। उर्दू में यह शेष बह्रें इस कारण अप्रचलित हैं कि इनकी रचना उर्दू भाषा की प्रकृति और बनावट से मेल नहीं खाती तथा शेर बहुत सुस्त, लयहीन और गद्यात्मक हो जाते हैं।


वैसे तो 'शाइरी' या 'कविताई' एक कठिन और दुस्साध्य कला है, परन्तु प्रकृति ने जिनके अन्दर इस कला के बीज स्वयं ही रोप दिये हों, उनके लिए उन्हें अंकुरित और विकसित करना कोई कठिन कार्य नहीं है। कुछ विद्वानों के मतानुसार प्रत्येक व्यक्ति जन्मजात कवि होता है। सभी मनुष्यों में कवित्व का अंश न्यूनाधिक मात्रा में प्राकृतिक रूप से विद्यमान रहता है, यह अंश जिन लोगों में जितना अधिक होता है, वह उतने ही शीघ्र सफल कवि अथवा शाइर बन जाते हैं।


शाइरी-कला अर्थात् 'अरूज़' अपने आप में एक पूर्ण विज्ञान है। यह विज्ञान, भाषा-विज्ञान एवं स्वर- विज्ञान (गायन कला) को मिलाकर बना है। जैसा सभी जानते हैं कि विज्ञान का विषय सामान्यतः थोड़ा शुष्क और अरुचिकर होता है, उसे पूर्ण मनोयोग के साथ समझ- समझकर ही सीखा जा सकता है। ठीक इसी प्रकार शाइरी - कला के नियमों को भी पूर्ण मनोयोग और धैर्य के साथ पढ़ने और समझने की आवश्यकता होती है। ऐसा करने पर कठिन प्रतीत होने वाली बात भी आगे चलकर सरल और रुचिकर लगने लगती है।


जिन्हें अपने अंदर कवित्व का अंश पर्याप्त मात्रा में विद्यमान प्रतीत होता हो और उचित प्रयास के बाद, शाइरी-कला के नियम समझना जिन्हें रुचिकर लगे, यह ज्ञान उन्हीं के लिए है। जिन्हें शाइरी के नियम समझना भार प्रतीत हो, कवित्व के अंशों का कुछ अता-पता न हो, उन्हें इस ओर से अपना मन हटाते हुए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने उन्हें इस कथित 'रोग' से मुक्त रखा। वैसे शाइरी के नियम समझना बहुत कठिन भी नहीं है, बस कुछ परिश्रम और धैर्य की आवश्यकता होती है। थोड़ा आगे बढ़ते ही न केवल सब कुछ सुगम और सरल प्रतीत होने लगता है बल्कि एक विशेष प्रकार का आनन्द भी आने लगता है।


शेरगोई और ग़ज़ल-सृजन के नियमों का पूरा वर्णन इस छोटे से आलेख में नहीं किया जा सकता। उसके लिए पर्याप्त समय और स्थान की आवश्यकता है। यहाँ हम 'अरूज़' से जुड़ी हुई कुछ आवश्यक और मूलभूत जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं।

इस शीर्षक के अन्तर्गत प्रश्नोत्तरी के रूप में ऐसे 'स्वाभाविक प्रश्नों के उत्तर यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जो शाइरी-कला के प्रत्येक विद्यार्थी के मस्तिष्क में सामान्यतः पाए जाते हैं, अथवा जिनकी जानकारी प्रत्येक शाइर या ग़ज़लकार को अवश्य होनी चाहिए।


प्रश्न:- शेर किसे कहते हैं ?


उत्तर'- शाइरी के नियमों में बंधी हुई दो पंक्तियों की ऐसी काव्य-रचना को शेर कहते हैं जिसमें पूरा भाव या विचार व्यक्त कर दिया गया हो। 'शेर' का शाब्दिक अर्थ है- 'जानना' अथवा किसी 'तथ्य' से अवगत होना।


प्रश्न:- 'मिसरा' किसे कहते हैं ?


उत्तर:- शेर जिन दो पंक्तियों पर आधारित होता है, उसमें से प्रत्येक पंक्ति को 'मिसरा' कहते हैं। 'शेर' की प्रथम पंक्ति को 'मिसरा-ए-ऊला' (प्रथम मिसरा) तथा द्वितीय पंक्ति को मिसरा-ए-सानी (द्वितीय मिसरा) कहते हैं।


प्रश्न:- 'क़ाफ़िया' किसे कहते हैं ?


उत्तर:- अन्त्यानुप्रास अथवा तुक को 'क़ाफ़िया' कहते हैं। इसके प्रयोग से शेर में अत्यधिक लालित्य उत्पन्न हो जाता है और इसी उद्देश्य से शेर में क़ाफ़िया रखा जाता है, अन्यथा कुछ विद्वानों के निकट शेर में क़ाफ़िया होना आवश्यक नहीं है, परन्तु अपने गुणों के कारण अब शेर में क़ाफ़िया की उपस्थिति अनिवार्य हो गई है।


प्रश्न:- 'रदीफ़' किसे कहते हैं ?


उत्तर:- शेर में क़ाफ़िया के बाद आने वाले शब्द अथवा शब्दावली को 'रदीफ़' कहते हैं। रदीफ़' का शाब्दिक अर्थ है, 'पीछे चलने वाली'। क़ाफ़िया के बाद, रदीफ़ के प्रयोग से शेर का सौन्दर्य और अधिक बढ़ जाता है, अन्यथा शेर में रदीफ़ का होना भी कोई आवश्यक नहीं है। रदीफ़ रहित ग़ज़ल अथवा शेरों को 'ग़ैर मुरद्दफ़' कहते हैं।


प्रश्न:- 'मतला' किसे कहते हैं ?


उत्तर:- ग़ज़ल के प्रथम शेर को 'मतला' कहते हैं, जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया होता है। यदि दोनों मिसरों में काफ़िया न हो तो प्रथम शेर होने के बावजूद शेर को 'मतला' नहीं कहा जाएगा। ग़ज़ल का प्रथम शेर सामान्यत: मतला ही होता है। एक ग़ज़ल में एक से अधिक मतले भी हो सकते है, जिन्हें 'हुस्ने मतला' कहा जाता है।


प्रश्न:- 'मक़्ता' किसे कहते हैं ?


उत्तर:- ग़ज़ल के अन्तिम शेर को 'मक़्ता' कहते हैं, जिसमें शाइर अपना उपनाम सम्मिलित करता है। यदि ग़ज़ल के अन्तिम शेर में शाइर का उपनाम सम्मिलित न हो तो उसे भी सामान्य शेर ही माना जाएगा। उपनाम को उर्दू भाषा में 'तख़ल्लुस' कहते हैं।


प्रश्न:- 'बह्र' किसे कहते हैं ?


उत्तर:- लय और संगीतात्मकता की दृष्टि से

जिस सूत्र (छन्द) के आधार पर शेर की रचना की जाती है, उस सूत्र को बह्र कहते हैं। बह्रें अनेक हैं।


प्रश्न:- 'बह्रों' की रचना किस प्रकार की है और उनका प्रयोग कैसे किया जाता है ?


उत्तर:- हमारी भाषाओं और बोलियों में जितने भी शब्द प्रचलित हैं, उनके उच्चारण में एक निश्चित समय लगता है। शब्दों के उच्चारण में लगने वाले समय को मापने के लिए कुछ 'बाट' निश्चित किये गये हैं, जिन्हें 'अरूज़' की भाषा में 'सबब' और 'वतद' कहते हैं। 'सबब' दो- अक्षरों वाले शब्दों का माप है और 'वतद' तीन अक्षरों वाले शब्दों का। 'सबब' और 'वतद' से मिलकर बह्र के टुकड़ों की रचना होती है तथा उन्हीं टुकड़ों से मिलकर बह्रें बनती हैं। बह्रों के टुकड़ों के स्थान पर, उनके समान-भार वाले तथा अपने भावों को व्यक्त करने वाले सार्थक शब्द रख देने से जो पंक्ति बनती है, उसी को 'मिसरा' कहते हैं। दो मिसरों से मिलकर 'शेर' बनता है। यही बह्रों के प्रयोग का तरीक़ा है। शेर में 'लय' और संगीतात्मकता बह्र के आधार पर ही होती है। बह्र जितनी अच्छी होगी, शेर भी उतना ही अधिक लयपूर्ण और मुतरन्नुम होगा।


प्रश्न:- 'वज़्न' किसे कहते हैं ?


उत्तर- 'वज़्न' का शाब्दिक अर्थ है - 'भार'। इसे सामान्य जीवन में हम इसी अर्थ में प्रयोग करते हैं। शाइरी की भाषा में 'वज़्न' और बह्र समानार्थी अर्थात् पर्यायवाची हैं। वस्तुतः बह्र के टुकड़ों का जो स्वरभार और वर्ण व्यंजन-क्रम होता है, उसे ही वज़्न कहते हैं। 'वज़्न' का एक अर्थ 'महत्व' तथा 'अहमियत' आदि भी है, इसी आधार पर कुछ लोग शेर के भावात्मक मूल्य को भी वज़्न कहते हैं। आम-तौर पर लोग इसका उच्चारण 'वज़न' के रूप में करते हैं जो अशुद्ध है।


प्रश्न:- बह्र के टुकड़ों को किस नाम से जाना जाता है ?


उत्तर:- बह्र के टुकड़ों को 'रुक्न' कहते हैं। रुक्न शब्द एकवचन है, इसे बहुवचन में अर्कान कहा जाता है। 'रुक्न' को हिन्दी छन्दशास्त्र में 'गण' कहा गया है। 

प्रश्न:- 'तक़्तीअ' किसे कहते हैं?


उत्तर:- 'तक़्तीअ' शब्द, 'क़ता' शब्द से बना है। 'क़ता' शब्द का अर्थ है- खण्ड, टुकड़ा, भाग या हिस्सा। किसी वस्तु के समुचित और सोद्देश्य विखण्डन को 'तक़्तीअ करना' कहेंगे। अरूज़ में किसी शेर या उसके मिसरे को बह्र के अर्कान के आधार पर विभाजित करने को 'तक़्तीअ करना' कहते हैं। तक़्तीअ करने से शेर के बह्रयुक्त और छान्दसिक रूप से शुद्ध अथवा अशुद्ध होने का सही पता चल जाता है।


प्रश्न:- 'अरूज़' किसे कहते हैं?

उत्तर - 'शाइरी कला शास्त्र' को 'अरूज़' कहते हैं। 'अरूज़' का ज्ञाता 'अरूज़ी' कहलाता है। 'अरूज़' एक विश्वविख्यात काव्य-कला है। इसकी जानकारी के बग़ैर कोई व्यक्ति सफल और शिल्प की दृष्टि से आत्मनिर्भर शाइर नहीं बन सकता। 

प्रश्न- 'ग़ज़ल' के विषय में कुछ जानकारी दें।


उत्तर- उर्दू, फ़ारसी की एक प्रमुख तथा अत्यधिक लोकप्रिय काव्य-विधा का नाम 'ग़ज़ल' है, जिसमें प्राय: पाँच से लेकर ग्यारह तक शेर होते हैं। ग़ज़ल के सभी शेरों का रदीफ़- क़ाफ़िया एक ही होता है, किन्तु प्रत्येक शेर विषय और कथ्य की दृष्टि से स्वतंत्र होता है। ग़ज़ल का प्रथम शेर 'मतला' कहलाता है, जिसके दोनों मिसरे सानुप्रास होते हैं और अंतिम शेर को 'मक़्ता' कहते है जिसमें शाइर अपना 'तख़ल्लुस' (उपनाम) लाता है। ग़ज़लों के संग्रह को 'दीवान' कहते हैं। ग़ज़ल का प्राचीन और सर्वमान्य अर्थ है 'प्रेमिका से वार्तालाप', किन्तु ग़ज़ल के कथ्य में  हुए व्यापक विस्तार के बाद अब उसका यह अर्थ, अपूर्ण कहा जायेगा। पहले ग़ज़ल का मुख्य विषय 'प्रेम' तथा प्रेम-जनित विभिन्न स्थितियों का वर्णन ही हुआ करता था। अब मानव जीवन की प्रत्येक स्थिति सुख-दुख, हर्ष-विषाद, भाव-अभाव, तथा घर-आँगन, खेत- खलिहान से लेकर मिल कारख़ाने, कालेज दफ़्तर, चौपालों और संसद तक जो कुछ देखा और अनुभव किया जाता है, उस सब का वर्णन ग़ज़ल में किया जाने लगा है। अब हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों में भी ग़ज़ल की रचना की जाने लगी है।


प्रश्न- 'शाइर' के सम्बन्ध में कुछ बतलाइए।


उत्तर- 'शेर' की रचना करने वाले को 'शाइर कहते हैं। 'शाइर' शब्द का अर्थ है- 'जानने वाला' शाइर जिन भावों और विचारों को व्यक्त करता है, वह उनसे भली-भांति परिचित और अवगत होता है, इसीलिए शेर के रचयिता को 'शाइर' कहते हैं। वस्तुतः शाइर ऐसा चिन्तक और विचारक होता है जो अपना चिंतन लयबद्ध शब्दों में व्यक्त करता है। लयबद्ध होने के फलस्वरूप समाज को उसका चिंतन ग्रहण करने और उसे याद रखने में सुविधा होती है। चिंतनहीन और विचार-रहित रचनाओं को 'शाइरी' तथा ऐसी रचनाओं के सृजनकर्ता को शाइर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि शाइरी शब्दों को लयबद्ध करने का नहीं, अपितु लयबद्ध शब्दों में लोकोपयोगी भावों और विचारों को व्यक्त करने का नाम है। जो शाइर इस शर्त को पूरा करते हैं वे विद्वानों, समाज-सुधारकों, दार्शनिकों और संतों की श्रेणी में स्थान पाकर अपनी कालातीत रचनाओं के द्वारा अमर हो जाते हैं। जबकि महज़ तुकबंदी करने वाले कथित शाइर अपने जीवन के मूल्यवान समय को नष्ट

करते हुए अन्ततः गुमनामी के अंधेरे में खो जाते हैं। इस शब्द का शुद्ध उच्चारण 'शाइर' ही है। कुछ लोग इसे 'शायर' लिखते हैं जो अशुद्ध है। सुविख्यात कोशकार मुहम्मद मुस्तफ़ा ख़ां 'मद्दाह' ने अपने प्रसिद्ध उर्दू-हिन्दी शब्दकोश में 'शाइर' ही लिखा है। शाइर शब्द का बहुवचन 'शुअरा' है। महिला शाइर को 'शाइरा' कहते हैं शाइरा का बहुवचन 'शाइरात' है।


प्रश्न- किसी नवोदित शाइर को कुशल और दक्ष शाइर या ग़ज़लकार बनने के लिए क्या करना चाहिये ?


उत्तर -शाइरी में दक्षता और कुशलता प्राप्त करने के लिए अनेक बातें ज़रूरी हैं। जिस प्रकार, किसी भी कार्य में सफलता अर्जित करने के लिये उस कार्य के प्रति लगन और समर्पण का होना आवश्यक होता है, उसी प्रकार शाइरी-कला में दक्षता प्राप्त करने के लिये भी लगन - और समर्पण का होना सबसे पहली आवश्यकता है। शाइरी जिस भाषा में करनी हो, उसका समुचित ज्ञान होना भी ज़रूरी है। इस समुचित ज्ञान में, उस भाषा के अधिक-से-अधिक शब्दों का भण्डार, उसके व्याकरण की जानकारी, अधिक-से-अधिक शब्दों के 'विलोम' और 'पर्यायवाची' शब्दों की जानकारी तथा उस भाषा में रचे गये स्तरीय साहित्य का अध्ययन भी सम्मिलित है। 'मुहावरों' और 'मिथकों की जानकारी भी होनी चाहिये। शाइरी शुरू करने से पूर्व उसके आधारभूत नियमों की जानकारी करना बहुत ज़रूरी है। इसके लिए किसी जानकार व्यक्ति का सहयोग अथवा 'अरूज़' से संबंधित पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेखों का अध्ययन करना उपयोगी होगा। नवोदित शाइर अपने इलाके में मौजूद सृजनधर्मी शाइरों / ग़ज़लकारों का सानिध्य प्राप्त कर उनसे भी उचित मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है। यह कुछ ऐसी ज़रूरी बातें हैं जिन पर अमल करके कोई भी नवोदित शाइर, सही दिशा में आगे बढ़ते हुए, शेरगोई यानी शाइरी कला में कुशलता और दक्षता प्राप्त कर सकता है। 000


         ✍️नासिर अली 'नदीम'



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