न कोई उम्मीद न कोई भविष्य ....और फफक पड़े लाचार बुंदेलखंडी


विकास के वट वृक्ष तले भाग्य अथवा दुर्भाग्य से सूखता बुन्देलखण्ड में चित्रकूट के घाट पर न तो संतों की भीड़ है और न ही चन्दन घिसने के लिए तुलसीदास जी है हाॅ, बुंदेलखण्ड की व्यथा सुनने के लिये कोई तैयार नही है। विकास के नाम केंद्र द्वारा 7266 करोड रूपए दिए गए हैं लेकिन राज्य ने सिर्फ 9 प्रतिशत ही विकास योजनाओं पर खर्च किया है। पैकेज बन्दर बाॅट का कारण बन गया है। रोज नये घोटाले प्रकाश में आ रहे है लेकिन दर्द के आॅसू बुन्देली कहे तो किससे कहें ? फफक पड़ते बुन्देलखण्डीयों का करूण-क्रन्दन बीच कई कारूणिक कथाएं सुनाई देती है। सुनने वालों की आंखों के कोर भी गीले हो जाते है। रो-रोकर अपना हाल बताने वालों में भूख और कर्ज से मरे हुए किसानों के परिजन है। पेंसन व राशन के लिए वर्षो से भटक रही निराश्रित विधवाएं वृद्ध है। रोजगार गारण्टी से धोखा खाए श्रमिक तथा दबंगों और दलालों की लाठी-बंदूकों के सायें में जीने वाले कुछ जागरूक जन, प्रधान भी है और ऐसे युवक भी जिन्हें अपनी और अपने गरीब समुदाय के हक के लिए लिखा-पढ़ी करने के गुनाह में असरदारों ने पुलिस से सांठ-गांठ कर थाने की यातना तथा जेल भिजवाया है। सात जिलों जालौन, महोबा, हमीरपुर, ललितपुर, झांसी, बांदा, चित्रकूट में अनगिनत किस्से है। महोबा के अतरारमाफ गांव की बेवा शीला सिंह ने अपने घर की दास्तान सुनाते हुए बताया कि उसके पति के नाम दस बीघे जमीन है। पिछले पांच वर्षो से जितना बोया जाता है उतना भी अनाज नहीं होता। खेती के खर्च के लिए पति चन्द्रपाल सिंह ने बैंक से 38 हजार ऋण लिया। खेती ने पैसा तो सोख लिया लेकिन खाने के लिए अनाज पैदा नहीं हो पाया। घर से भुखमरी की स्थिति बन गई। आजीवकिा के लिए साहूकारों से भी कर्ज लेना पड़ा। पति चिंता में भूखे सोते थे। बच्चे भूख से तड़पते तो वे दुखी होकर रात-रात भर रोते रह जाते थे। आठ माह पहले वे फांसी लगाकर मर गए। अब नाबालिग बच्चों के साथ मैं भूखों मर रही हूं। सरकार से कोई सहायता नहीं मिली। महोबा के ही अलीपुर गांव के गोपाल सिंह पूरा परिवार आत्महत्या के इरादे से रेल की पटरी पर सोया था। इस घटना में उसकी पत्नी की जान गई थी तथा गोपाल उसके नाबालिग बेटे के हाथ कट गए। गोपाल ने बताया कि उसने पांच वर्ष पहले बैंक से साढ़े तीन लाख का ट्रैक्टर खरीदा था। सूखा पढ़ने के कारण खेती से कोई कमाई नहीं हो पाई। जो जमीन थी वह भी नीलाम हो गई। परिवार का पेट पालना मुश्किल पड़ गया। कंगाली से हारकर पत्नी और बच्चे सहित आत्महत्या कर कर्ज से मुक्ति का कोई दूसरा रास्ता नहीं मिला इसलिए गांव के समीप रेल की पटरी पर पहुंच गए। पत्नी के प्राण चले गए और अभागे बाप-बेटे अपना हाथ गंवा बैठे। कर्ज और भूख ने बर्बाद कर दिया।
बुन्देलखण्ड में घोर गरीबी के कारण भी लोगों का जीना मुश्किल पड़ रहा है। सूखा बुन्देलखण्ड क्षेत्र की नियति हो गयी है पिछले पांच वर्षो से सूखा से जूझ रहे लोगों की भयावह हालात की पड़ताल में लगने लगा है। कि परिथितियां धीरे-धीरे 19 वीं सदीं के भंयकर अकाल जैसी बनती जा रही है। मानसून ने बुन्देलखण्ड में अपनी पिछले सभी रिकार्ड तोड़ दिएं हैं। किसान सूखे की मार झेल रहे हैं और सत्ता मरहम लगाने की बजाय चाबूक चला रही है। मध्यप्रदेश के बुन्देलीभाग में पानी रोक कर हरियाली लाने वाले गिरीश पटैरिया  कहते है सरकार जब तक जमीनी हकीकत को नही देखेगी तब तक पानी का टोटा रहेगा। यहां चेक डेम राजनेताओं के जेब भरने के माध्यम बने हुए है। इसी लिए करोड़ों खर्च करने के बाद भी बुन्देलखण्ड में सूखा है। यहां का किसान भूखा है। बुंदेलखंड के बड़े काश्तकार भी फकीर हो गये है। सूखाजनित तंगहाली से हो रही आत्महत्या की घटनाएं इसकी गवाह है। महोबा जनपद के खन्ना थाने के अकबई गांव में 40 बीघे जमीन की मालकिन फूलवती का आत्मदाह इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। घटना से सरकार चेते न चेते किसानों के जख्म और गहरे हो गये है। महोबा जनपद के अकबई गांव में सोमवार को आत्मदाह करने वाली महिला फूलवती की शादी करते समय इसके पिता वरदानी को बड़ा सुकून था कि वह बड़े किसान के घर पहुंची। बेटी जिंदगी भर खुशहाल रहेगी। बीते सालो से सूखे की काली छाया ने यहां के बड़े खेतहरों को ही कंगाल कर दिया है। खेतों में डाला बीज भी वापस नहीं मिला तो बैंकों से कर्जा लेना पड़ा। इन्हीं हालात में मृतिका के पति ज्ञानेंद्र को इलाहाबाद बैंक मटौंध से दो लाख कर्ज लेना पड़ा। खेती लगातार धोखा देती गई तो किश्तें अदा नहीं हो पायी और कर्ज बढ़कर तीन लाख से ऊपर हो गया। खेती के लगातार धोखा देने से कर्ज बढ़ता गया पति की लाचारी और बच्चों के भविष्य में लगा प्रश्नचिन्ह वह बर्दाश्त नहीं कर सकी और आत्मदाह कर लिया। चित्रकूट जनपद की अतर्रा तहसील के अभवां ग्राम के किसान राम सिपाही इलाहाबाद बैंक की चेतावनी के सदमें में मौत के मुँह में चले गये। यह कहानी केवल एक दो किसानों की नहीं जिले के सैकड़ों किसान इन्हीं हालात से रूबरू है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बुंदेलखंड इलाके में गरीबी और कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्या और भूख से मरने के मामले पर कड़ा रूख अपनाते केन्द्र और राज्य सरकार को हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया। खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि बुंदेलखंड में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों  तथा गरीबों को अन्त्योदय कार्डों की जांच कराये और फर्जी कार्डों को तुरन्त रद्द करें। खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि हलफनामे में बुंदेलखंड में चल रही विकास योजनाओं का विस्तार से जिक्र होना चाहिये। अदालत ने बैंक समेत सभी वित्तीय संस्थानों से किसानों से ऋण की वसूली स्थगित करने का भी आदेश दिया। इससे पूर्व न्यायमूर्ति सबरजीत सिंह तथा न्यायमूर्ति सुनील अंबवानी की खंडपीठ ने भी ऋण की वसूली रोकने का आदेश दिया था। इसी मामले को लेकर पिछले 16 जून को एक जनहित याचिका भी दायर की गयी थी, जिसे हावर्ड विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने दाखिल किया था। छात्रों ने बुंदेलखंड के सर्वेक्षण में पाया था कि इलाके में बडी संख्या में कर्ज में डूबे किसानों ने आत्महत्या की है और भूख से उनकी मौत हुई है। भयावह सच यह है कि अकेले बाॅदा जनपद में पिछले छह माह में करीब 300 लोगों ने जान देने का प्रयास किया, आंकड़ों के खेल से कहीं अधिक मानवीयता जरूरी थी लेकिन सरकार मौत के कारणों को दिलचस्प मोड़ देकर पतला झाड़ती है। बुन्देलखण्ड में प्राकृतिक संपदा का  जबर्दस्त दोहन ने हालत खराब कर दिये है। 1982 में जो औद्योगिक आस्थान तैयार कराये गये थे वे उजड़ गये है। फैक्ट्रियां बंद होने से बेरोजगार हुए कामगारों के परिवारों से बुंदेलखंड में आत्महत्याओं की शुरूआत 1996 से ही हो गयी थी लेकिन 1999 के बाद तो खाते-पीते किसान तक बर्बाद होने लगे। 2003 से 2008 के बीच बुंदेलखंड के 500 किसान-मजदूर आत्महत्या या सदमे की वजह से अकाल मौत का निवाला बने। शासन प्रशासन ने इसे संज्ञान में नहीं लिया।  बाँदा जनपद के  रानीपुर, कमासिन निवासी छुक्कू सिंह ने फांसी लगा ली।  युवा किसान को पहले सूखे ने आहत किया और कर्ज लेने को मजबूर किया।  काजीपुर गिरवां, नरैनी निवासी मुन्ना ने आग लगाकर जान दी थी। वह लोगों के खेतों पर काम करके परिवार वालों का भरण पोषण करता था। सूखा पड़ जाने के कारण उसे काम मिलना बंद हो गया था। अतरहट, चिल्ला निवासी किसान रामराज ने कर्ज से परेशान होकर जहरीला पदार्थ खाकर जान दे दी तो कुछ इसी तरह तिंदवारी निवासी कल्ली ने जहर खाकर जान दे दी थी। झांसी जनपद में किसानों द्वारा आत्महत्या करने का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। बैंक द्वारा कर्ज चुकता करने के लिए भेजे गए नोटिस से परेशान होकर
गरौठा थाना क्षेत्र के ग्राम मथनियां निवासी साठ वर्षीय किसान जगोले कोरी ने आत्म हत्या कर ली। झांसी में सवा दो वर्ष में 504 ने लगाया मौत को गले लगाया है। यह आकड़ा सरकार को चैकाता नही है। 
इनमें पंद्रह किसान भी हैं, जो कर्ज के मकड़जाल में फंसे हुए थे। हालांकि, प्रशासन एक को छोड़कर अन्य मौतों को गरीबी व कर्ज से नहीं मानता है। लेकिन, हाईकोर्ट के आदेश पर प्रशासन द्वारा जुटाए गए यह आंकड़े यहां की भयावह तस्वीर जरूर दिखलाते हैं। बुंदेलखंड में लगातार हो रहीं आत्महत्याओं को स्वतः संज्ञान में लेते हुए उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों मुख्य सचिव को कोर्ट में तलब कर केंद्र व प्रदेश सरकार से पूछा था कि किसानों के हित में क्या योजनाएं चल रही हैं और उनके कर्ज की स्थिति क्या है? कितने किसानों ने कर्ज के कारण मौत का वरण किया है? हाई कोर्ट के पूछने पर सक्रिय हुए स्थानीय अमले ने वर्ष 2009 -10, 2010-11 व 2011-12 में अब तक हुई आत्महत्याओं के मामलों को एकत्र किया। कुल 504 आत्महत्याओं के प्रकरण सामने आए। इनमें 15 प्रकरण किसानों पर कर्ज के थे। रक्सा के ग्राम इमलिया निवासी टिल्लू, सिजवाहा निवासी वीर सिंह व बामौर के ग्राम सुट्टा निवासी नसीर शाह को किसान क्रेडिट कार्ड का कर्जदार बताया गया। लेकिन प्रशासन का मानना है कि टिल्लू ने शराब के नशे में कीटनाशक का सेवन कर आत्महत्या की थी। वहीं वीर सिंह ने पुत्रों के बीच जमीनी बंटवारे को सामंजस्य न बन पाने के कारण जान दी। वैसे नसीर शाह पर अस्सी हजार केसीसी का कर्ज था लेकिन प्रशासन ने आत्म हत्या का कारण पारिवारिक कलह माना। 
प्रशासन ने वर्ष 2009 में आत्महत्या करने वाले ग्राम बैदोरा निवासी प्राण सिंह पुत्र लक्ष्मण सिंह की आत्म हत्या को जरूर कर्ज व गरीबी के कारण माना। शासन को भेजी गई रिपोर्ट में कहा गया कि प्राण सिंह की पत्नी बीमार थी, जिसके इलाज में उसने काफी राशि खर्च कर दी थी। एक एकड़ भूमि के मालिक प्राण सिंह ने पचास हजार रुपये किसान क्रेडिट कार्ड से कर्ज लिया था। और लोगों से भी इतनी ही रकम ली थी। इसके बाद भी पत्नी की मौत हो गई थी। आर्थिक तंगी से जूझ रहे प्राण सिंह का दो नाबालिग बच्चियां होने के कारण मानसिक संतुलन खराब हो गया था, जिस कारण उसने जान दे दी। 
मरने वालों में पुरुष ज्यादा
झांसी जनपद में  सवा दो साल में कुल 504 लोगों ने आत्महत्याएं की, जिनमें 255 पुरुष व 249 महिलाएं हैं। यदि वर्षवार देखा जाए तो 2009 - 10 में 85 पुरुष और 118 महिलाओं ने आत्महत्या की, जबकि वित्तीय वर्ष 2010 - 11 में 135 पुरुष और 123 महिलाओं ने मौत को गले लगाया। पिछले दो माह के दौरान 35 पुरुष व 8 महिलाओं ने आत्महत्या की है। प्रशासन द्वारा जुटाए गए आंकड़ों में 41 ऐसे लोग रहे जिन्होंने नशे में मौत को गले लगा लिया। वर्ष 2009 - 10 में 13, वर्ष 2010 - 11 में 21 लोगों ने मौत को गले लगाया। वर्तमान वित्तीय वर्ष के दो माह यानी कि अप्रैल व मई माह में 7 लोगों ने नशे में आत्महत्या कर ली। क्योकि बुन्देलखण्ड में सरकारी योजनाऐं भ्रष्टाचार की भेंट चड़ रही है। माया सरकार में सबसे ताकतवर मंत्री बुन्देलखण्ड के होने के बावजूद भ्रष्टाचार रूकने की जगह और तेज हो गया है। प्रदेश कांग्रेस द्वारा हाल में गठित केन्द्रीय योजना मानेट्रिंग कमेटी के बुन्देलखण्ड प्रभारी भानुसहाय बताते है कि 
वन विभाग के अधिकारियों ने जो कारनामा किया है, वह कम हैरतगैंज नहीं कहा जा सकता है।  वर्ष 2008-09 में झांसी, महोबा, ललितपुर, जालौन में स्पेशल ट्री प्लाण्टेशन कार्यक्रम चलाया था। इस प्रोजेक्ट पर करोड़ों रूपए खर्च किए गए। वन प्रबन्धक ने सामाजिक वानिकी विभाग समस्त प्रभागीय अधिकारियों को पत्र भेज कर सभी जिलांे की नर्सरी से बुन्देलखण्ड के सम्बन्धित जिलों को विशेष आकार के पौधों को भेजने को कहा था। इनमंे जंगल जलेबी, बबूल, विलायती बबूल, यूकेलिप्टस, रोबिनिया, सिरस, सूबबूल, कठबेर, जामुन प्रजाति के पौधे मंगाए गये थे। मामला बड़े बजट से जुड़ा था, सो इन पौधों की आपूर्ति के नाम पर लूट का खेल शुरू तो हुआ लेकिन सरकार ने लीपा पोती कर दी परन्तु सूचना के अधिकार ने इस घोटाले की पोल खोल दी क्योंकि  जिलों से पौधों की आपूर्ति का जिम्मा कुछ अधिकारियों ने खुद लिया। इसमें देवरिया जिले सोन्दा सदर, सुरौली, पथरदेवा, रामपुर कारखाना, गौरीबाजार, बेतालपुर, सलेमपुर, भागलपुर, बहरज, भलअनी, भटनी, बनकटा व भाटपार रानी से विविध प्रजातियों के लाखों पौधे बुन्देलखण्ड भेजे गए थे। इसके लिए विभाग द्वारा लाखों रूपये का भुगतान भी किया किया। यह पौधे बुन्देलखण्ड के जिलों मंे पहुॅचे या नहीं, इसकी जानकारी के लिए जन सूचना अधिकार के तहत देवरिया के डेमुसा निवासी जगमोहन ने वन विभाग से जानकारी माॅगी। यह भी जानना चाहा कि इस साधन से वन विभाग ने लाखों पौधे बुन्देलखण्ड क्षेत्र में भेजे? वन विभाग ने उन ट्रकों का नम्बर सहित ब्यौरा उपलब्ध कराया, जिनसे पौधों को भेजा गया था। वन विभाग द्वारा  सूची मंे ट्रक नम्बर के अलावा चालक व वाहन स्वामी के नामों का भी उल्लेख किया गया था। इसमें देवरिया जिले के अलावा कई अन्य जिलों मंे पंजीकृत ट्रकों का विवरण शामिल था।
वन विभाग के जवाब के आधार पर देवरिया के परिवहन विभाग से जानकारी माँगी गई, तो वन विभाग के कारनामें का पर्दाफाश हो गया। देवरिया परिवहन विभाग के अनुसार  वन विभाग द्वारा ट्रकों के जो नम्बर जवाब मंे दिये गये थे, उन नम्बर पर देवरिया के परिवहन विभाग में कोई ट्रक पंजीकृत ही नही है। वन विभाग के अभिलेखों मंे पौधा ले जाने वाले ट्रक संख्या यूपी 52 एफ-6244 आटों रिक्शा का नम्बर निकाला। इसी तरह यूपी 52 एच-2976 नम्बर ट्रैक्टर का, यूपी 52 सी-6244 कार का निकाला।  नम्बरों के ट्रक स्वामियों के जो नाम व पते बताए गए थे, वे भी फर्जी निकले। किसानों को निःशुल्क कृषि उपकरण वितरण से लेकर टेक्टर वितरण का खेल में लाभार्थीयों से अगूठा लगवाकर सत्ता के सौदागर लूट रह्र है लेकिन उनकी जाँच केन्द्र और राज्य सरकार के तू-तू-मैं-मैं में उलझ कर रह गई है। प्रदेश के मुख्य सचिव को कृषि उपकरण वितरण में हुई भारी धांधली दिखाई नही देती है जबकि दस्तावेज चीख-चीख कर बता रहे है कि जालौन में कृषि उपकरण सप्लाई का ठेका साईकिल स्टोर के माध्यम से पूरा किया गया है तो अन्य जनपदों में कुछ-कुछ यही हाल है। बुन्देलखण्ड कांग्रेस के संस्थापक अभिनेता राजा बुन्देला कहते हैं कि उच्च न्यायालय की पहल के बाद उम्मीद है कि बहुत सी धांधलिया सामने आ जायेगी।




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यह स्टोरी 2011 में कई पत्र और पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी,दस्तावेज-2011 के तहत तत्कालीन समय के राजनैतिक माहौल को समझाने के उद्देश्य  से पुनः प्रकाशित कर रहे है।


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यह आलेख कापीराइट के कारण किसी भी अंश का पुर्न प्रकाशन लेखक की अनुमति आवाश्यक है।


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लेखक का पता


सुरेन्द्र अग्निहोत्री
ए-305, ओ.सी.आर.
बिधान सभा मार्ग,लखनऊ
मो0ः 9415508695,8787093085




 


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