पुरखों ने आत्मनिर्भर रहने तथा स्वरोजगार के उद्देश्य से गांव में रोजी रोटी के लिए 100 प्रकार के परंपरागत कुटीर उद्योग

गैर मशीनों के पुरखों ने आत्मनिर्भर रहने तथा स्वरोजगार के उद्देश्य से गांव में रोजी रोटी के लिए 100 प्रकार के परंपरागत कुटीर उद्योग आवश्यकता योग्यता सामाजिक समरसता के अनुसार स्त्री पुरुष दोनों की क्षमता के अनुरूप गांव खेत खलिहान में परंपरागत औजारों को जोड़ते हुए सृजित किए आसपास के गांव को कस्बों से मित्रता रहे सामंजस रहे इसका भी ध्यान रखा यह उनकी सोच समाज को जोड़ते हुए पलायन रोकने के साथ-साथ बिजली मशीनों पर निर्भरता ना हो स्थानीय स्तर पर संसाधन उपलब्ध हो इसका पूरा अध्ययन कर कुटीर उद्योग गृह उद्योग सैकड़ों वर्ष पहले परंपरागत विधि से प्रमाणित कर विभिन्न गांव में स्थापित किए जिनसे हजारों वर्षों से गांव में स्वरोजगार मिलने लगा था के साथ पलायन रुका गांव मजबूत हुए आपसी रिश्ते रहे विदेशी मशीनों तथा विदेशी व्यापारियों पर निर्भरता नहीं रही आज की उद्योगों में बड़ी-बड़ी मशीनों बिजली पावर हाउस की आवश्यकता है बड़े-बड़े संसाधन चाहिए जिसमें कम से कम श्रम शक्ति लगे ऐसे उपाय सरकारों ने खोजें और आम जनता को बेरोजगार किया।
परंपरागत कुटीर उद्योगों को नष्ट कर महानगरों की ओर पेट भरने के लिए गांव की आम जनता मजबूर हुई मैं खासकर बुंदेलखंड के क्षेत्र के विभिन्न गांव कस्बों में जिनका नाम वहां के कुटीर उद्योग के लिए मशहूर था उन गांव की चर्चा उनकी कुटीर उद्योग के कारण हर जगह कुछ गांव की चर्चा होती थी आपसे साझा कर रहा हूं। जैसे बांदा जिले के कालिंजर क्षेत्र में परंपरागत औषधियों के साथ शहद उत्पादन, अरहर की दाल, अतर्रा का चावल, बबेरू का तिलहन, चित्रकूट का कत्था, फतेहगंज की बर्फी, बदौसा की सब्जियां, पैलानी की शरौती, बांदा का सोहन हलवा, शेरपुर बराई मानपुर का पान, कालिंजर की लाठी, भरुआ का जूता, जैतपुर महोबा की खादी पान, श्रीनगर के तांबे के बर्तन, मऊरानीपुर का हथकरघा उद्योग, महोबा के गौरा पत्थर, श्रीनगर महोबा के पीतल के बर्तन, चित्रकूट के लकड़ी के खिलौने, बांदा की हथकरघा दरी, जैसे अनेकों कुटीर परंपरागत उद्योग छोटे-छोटे गांव में स्थापित थे। जखनी के मिट्टी के बर्तन बांस की डलिया, बैलगाड़ी प्रसिद्ध थी। इन उद्योगों में कुछ उद्योग कृषि पर आधारित है जैसे दाल बनाना, आटा पीसने, गन्ने का गुड़ निकालना, मधुमक्खी पालन, आचार मुरब्बा, कांस की रस्सी बनाना, जड़ी बूटियों कि पौधों को लगाना, मकई के भुट्टे चटाई बनाना, दोना पत्तल बनाना, झाढू बनाना, दलिया बनाना, चावल बनाना, मिठाई बनाना, दूध उत्पादन, मुर्गी पालन, गाय पालन, भैंस पालन, कुछ उद्योग रसायन आधारित है। पशुओं की खाल से जूता बनाना, कुटीर साबुन उद्योग, पापड़ बनाना, मोमबत्ती, अगरबत्ती, मेहंदी, मिट्टी का चंदन, चावल की लाई बनाना, धुलाई के लिए पाउडर बनाना, कुछ उद्योग परंपरागत ऊर्जा से संबंधित थे। बढ़ाई गिरी, लोहारी, गोबर के कंडे बनाना, गोबर गैस, कागज,फाइल बनाना, पवन चक्की, पीतल के बर्तन, तांबे के बर्तन, लकड़ी की नक्काशी, ईटा पथना छप्पड़ बनाना, कच्चा मिट्टी मकान बनाना, कलात्मक फर्नीचर बनाना, मोटर वाइंडिंग करना, चरपईया बनाना, यातायात के लिए हाथ गाड़ी, बैलगाड़ी, लकड़ी की नाव, साइकिल मरम्मत, तबला ढोल, चिमटा, मृदंग, डमरु जैसे वाद्य यंत्र वस्त्र उद्योग, हैंडलूम से विभिन्न प्रकार के कपड़ों का निर्माण करना, दरी धोती पहनने वाले कपड़े, हथकरघा से बुना गया कपड़ा बहुत ही आरामदायक होता है। हर गांव में कपड़ा बनता था पढ़ा, अनपढ़ कोई भी कर सकता है लोहा भी नहीं लगता स्वदेशी है रोजगार को शुरू कर सकता है।
अपने घर में रहकर सूत कातना धागा बनाना सिलाई, कढ़ाई, मछली पालन, परंपरागत पोशाक है ठंड से बचने के लिए रजाई आदि गांव में तैयार होती थी। सेवा उद्योग जिनमें मट्ठा लस्सी बनाना बकरी पालन भेड़ पालन, वैवाहिक शुभ अवसरों पर संगीत मंडली तैयार करना, सब्जी उगाना विभिन्न प्रकार के फल पैदा करना, प्रिंटिंग प्रेस, सोयाबीन की दरी बनाना किराना दुकान खोलना, चूड़ी की दुकान खोलना, चूना बनाना, तंबाकू पैदा करना, तेल कोल्हू जैसे विभिन्न प्रकार के कुटीर उद्योग, गांव में स्थापित थे। एक गांव में कोई कुटीर उद्योग था तो दूसरे गांव में कोई दूसरा कुटीर उद्योग था। वस्तु के बदले वस्तु मिल जाती थी आनाज के बदले गुडं, धान के बदले दाल, लकड़ी के बदले बैलगाड़ी, घी के बदले कपड़ा, मसाले इन सब के पीछे पूर्वजों की मनसा रही होगी गांव से गांव को जोड़ा जाए समाज से समाज को जोड़ा जाए पहले अस्पताल नहीं थे। लोग बीमार कम होते थे खानपान शुद्ध था हर 50 किलोमीटर की परिधि में परंपरागत वैद्य थे जो जड़ी बूटियों के जानकार थे नाड़ी देखकर मर्ज बता देते थे। एलोपैथिक दवाइयों ने लगभग उन्हें भी विदा कर दिया।
‌ हर 4 माह में एक बड़ा मेला लगता था जो 15 दिन का होता था इस मेले को किसी ना किसी राष्ट्रीय पर्व से जोड़ा जाता था।
जैसे- चिल्ला का मेला कालिंजर का मेला, महोबा का मेला, सिंहपुर मेला, चित्रकूट का मेला दुधारू अच्छे किस्म के जानवर के लिए बटेश्वर ग्वालियर के पास जाना पड़ता था। भिंड की भैंस दूध के लिए मशहूर थी, बैल के लिए कालिंजर मशहूर था, चना मसूर कटिया गेहूं के लिए गौरिहार मशहूर था अलसी सरसों के लिए तिंदवारी क्षेत्र मशहूर था अतर्रा के चावल का जलवा पूरे भारत में था। मूंग की दाल उर्द की दाल मसूर की दाल चने की दाल अरहर की दाल ज्वार बगैर खाद की लगभग हर क्षेत्र में होती थी। एक ही खेत में अरहर ज्वार मुंग तथा गेहूं अलसी चना एक साथ पैदा होती थी पशुओं को पर्याप्त मात्रा में आहार मिलता था। कपास की खेती बहुत बड़ी संख्या में होती थी
वर्तमान के विकास ने मिलावटी खाद्य भोजन दिया दाल गेहूं सब्जियों में केमिकल की मात्रा अधिक होने के कारण अधिकांश व्यक्ति बीमार रहने लगे रोज गोली खाना मजबूरी है पहले लोग कम बीमार होते थे 50 किलोमीटर के आसपास वैध हुआ करते थे हमें यदि अपनी समाज को निरोग करना है तो पुरखों की बनाई स्वरोजगार सामुदायिक परंपरागत कुटीर ग्रह उद्योग को बढ़ाना होगा पुरानी विधि से ही पलायन रुकेगा जन जानवर पानी किसानी जंगल पलायन गांव ही रोक सकता है रेल बनाने, जहाज बनाने, गोला बारूद बनाने जैसे बड़े उद्योग हर जगह नहीं स्थापित हो सकते आधुनिक बड़े उद्योगों के लिए बड़ी-बड़ी शिक्षा प्रशिक्षण चाहिए गांव का व्यक्ति इतना संपन्न नहीं है कि वे अपनी युवा पीढ़ी को देश विदेश में प्रशिक्षण दिला सकें पढ़ाने प्रशिक्षण के बाद भी नौकरी की कोई गारंटी नहीं है करोड़ों युवा बेरोजगार हैं उन मां-बाप से पूछे कर पता करें जिन्होंने लाखों रुपए लगाकर अपने बच्चों को शिक्षित करवाया है



अपनी जमीन बेच कर और बच्चे बेरोजगार बैठे हैं बैंकों के कर्ज तथा साहूकार ने समय से पहले उन्हें बुड्ढा कर दिया है। गांव सब को रोजगार देने में सक्षम है सरकारी तंत्र को गांव और क्षेत्र की सुविधा के अनुसार परंपरागत कुटीर उद्योगों को खड़ा करने में मदद करनी होगी हजारों उद्योग जो पहले चलते थे आज क्यों बंद है? चलाने वाले भी व्यक्ति रहे होंगे फिर आज क्यों नहीं चल सकते इस प्रश्न का उत्तर तभी मिलेगा जब हम गांव में काम करेंगे समस्या चाहे जितनी बड़ी हो लेकिन उसका समाधान उससे बड़ा होता है आज हमारे पास श्रम शक्ति है हमें इसका उपयोग करना चाहिए कम लागत में कुटीर उद्योग खड़े होते हैं जिनमें ज्यादा मशीनों की संसाधन की आवश्यकता कम होती है मैंने ऐसा गांव में रहकर देखा है हम जो विचार साझा करने के लिए रखे हैं वह पर्याप्त नहीं है और भी सैकड़ों प्रकार के उद्योग परंपरागत है जिन्हें शुरू किया जा सकता हैं अपनी क्षमता योग्यिता संसाधन के अनुसार हम कुटीर उद्योग स्वयं चयन करें इसे सुखद या संयोग ही कहे की सरकार पुनः स्वालंबन आत्मनिर्भर परंपरागत कुटीर उद्योग की और सरकार सोच रही है। प्रयास भी कर रही है जब आत्मनिर्भर गांव होंगे तभी देश आत्मनिर्भर होगा तंत्र से जुड़े जिम्मेदार जनों को कागज पर नहीं जमीन पर काम करना होगा मैं विषय का विशेषज्ञ नहीं हूं।



अगर किसी को गलत लगे तो मैं क्षमा प्रार्थी हूं यदि आप समस्याओं पर केंद्रित होते हैं तो समस्या ही पाते हैं और यदि आप संभावनाओं को टटोल ते हैं तो अवसर के दरवाजे खुल जाते हैं देश के तमाम महापुरुषों ने आत्मनिर्भर स्वालंबन कुटीर उद्योग के लिए सारा जीवन गांव में लगा दिया और उनके प्रयोग अनुभव आज भी खरे हैं फिर भी एक कोशिश ग्राम स्वराज। से ही भारत का गणराज्य मजबूत और सशक्त बनेगा


उमाशंकर पान्डेय की एफ बी से साभार


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