पारिजात: पहुंच दूर भी..आसान भी..

तीर्थाटन 


 पारिजात: पहुंच दूर भी..आसान भी..



उत्तर प्रदेश की राजधानी से सटे बाराबंकी जनपद मुख्यालय से कोई 40 किलोमीटर दूर किंटूर गांव (कुंतेश्वर मंदिर से करीब 3 किलोमीटर दूर) में दुर्लभ वृक्ष "पारिजात" है. पारिजात वृक्ष को लेकर कई कथाएं मान्यताएं प्रचलित है. ज्यादातर लोग जानते ही हैं हो सकता है अन्य प्रदेशों के दूरस्थ प्रदेशों के लोगों को इस वृक्ष की कथा मान्यता के बारे में ना पता हो. इसलिए थोड़ा जिक्र पारिजात की कथा का. 
मान्यता है कि यह पारिजात वृक्ष महाभारत कालीन है. समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में एक पारिजात वृक्ष भी था. देव इसे स्वर्ग लोक लेकर चले गए. अज्ञात वास के दौरान पांडवों की माता कुंती ने किंतूर गांव में ही शिवलिंग स्थापित किया था. अर्जुन अपनी तपस्या के बल पर स्वर्ग से पारिजात वृक्ष को धरा पर लाए और मंदिर के पास रोपित किया. माता कुंती पारिजात वृक्ष के फूल ही शिवलिंग पर चढ़ाती थी. एक मान्यता यह भी है कि पारिजात वृक्ष की पत्तियां कई रोगों में लाभकारी है. करीब 10 मीटर ब्यास वाले इस पारिजात वृक्ष की छाल-डाल, सब अद्भुत है. फिलहाल ऐसे वृक्ष के दर्शन हमने तो नहीं किया कहीं. किसी ने किए हो तो कह नहीं सकते.



महादेवा  (लोधेश्वर), कुंतेश्वर और पारिजात के साल में एक बार दर्शन की परंपरा माता-पिता ( स्मृति शेष कमला शंकर अवस्थी और  श्रीमती मोहिनी अवस्थी) से हम लोगों को विरासत में मिली. तीन दशक हो हो गए बाराबंकी के इन देव स्थानों पर दर्शन को जाते हुए.
सच है, इन देव स्थानों पर सड़के अच्छी बन जाने से पहुंच बहुत आसान हुई है. पहले जहां पहुंचने में 4 घंटे लग जाते थे अब यह समय घटकर 3 घंटे का हो गया है. बाराबंकी जनपद और आसपास के जिलों के लोगों के लिए यह देवस्थान काफी प्रसिद्ध है. सड़कें अच्छी बनने से दर्शनों के लिए भक्तों की तादाद भी बढ़ी है लेकिन साधन नहीं. आप अपनी गाड़ी से है तो तीनों देव स्थानों के दर्शन सुगमता से कर सकते हैं और अगर आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट से इन देव स्थानों के दर्शन की लालसा पूरी करना चाहते हैं तो आपको कई परेशानियों से गुजरना पड़ेगा. साधन पाने के लिए धक्के दिखाने पड़ेंगे और धूल भी. जरूरी है कि शासन-प्रशासन इन महाभारत कालीन देवी स्थानों के दर्शनों के लिए ऐसी बस सुविधा उपलब्ध कराए एक ही दिन में भक्तों की 9 देवी स्थानों के दर्शन कर घर को लौट सके.
यह तो बात हुई साधनों की. अब चलते हैं, मंदिर और पारिजात की ओर. भक्तों की संख्या बढ़ने से कुंटेश्वर मंदिर और पारिजात वृक्ष में अब प्रसाद की दुकानें लग गई है और दूसरे देव स्थानों की तरह आपको भी प्रसाद खरीदने के लिए मजबूर करने वाले प्रसाद विक्रेता मिल जाएंगे. दूसरे तीर्थ स्थानों की तरह यहां भी प्रसाद वाले आपसे जोर-जबरदस्ती और प्रार्थना गुजारिश सब करेंगे. चलिए, यह तो रोजी रोटी का मामला है.



तीन दशक पहले जब अपने माता-पिता के साथ जाना शुरू किया था और अब से 5 वर्ष पहले तक पारिजात वृक्ष को छूकर स्वर्ग में स्थान सुरक्षित करने की छूट भक्तों को थी. जैसे जैसे भक्तों की संख्या बढ़ी स्वर्ग से लाया गया यह वृक्ष भक्तों से दूर होता चला गया. यानी, अब आपको पारिजात के दर्शन दूर से ही करने हैं. पूछने पर यही कहा गया "कोरोना" के डर ने इस व्यवस्था को लागू कराया है. पारिजात देवी स्थान तक पहुंच आसान हुई तो पहुंच कर भी पहुंच से दूर पारिजात कर दिया गया चारों ओर लोहे का जाल है. इस की परिक्रमा करते हुए आप पारिजात के दर्शन कीजिए पूजन कीजिए अगरबत्ती-धूपबत्ती जलाइए और वापस चले आइए..
एक बात और, पारिजात वृक्ष में अगस्त माह में खिलने वाले फूल 1 किलो घी के बराबर हैं. पारिजात वृक्ष देवस्थान पर करीब साडे तीन दशक पहले 1986 में कनक बिहारी जी का एक मंदिर स्थापित हुआ. पारिजात के फूलों पर हक इस मंदिर के महंत और पुजारियों का ही है. अगर पारिजात का फूल रखकर आप अपनी किस्मत सवारना चाहते हैं तो 1 किलो भी ध्यान दीजिए आपको पारिजात का फूल प्राप्त होगा. और हां! एक बात जो खटकती है वह है इन देवी स्थानों के इर्द-गिर्द विकास की कमी की. इन देवस्थानों के आसपास अगर सरकार ठहरने की सरकारी व्यवस्था ही करे तो रात्रि रुकने चाहत लेकर आने वाले भक्तों को उसी दिन लौटने की मजबूरी खत्म हो सकती है.


अथ पारिजात कथा..
शास्त्रानुसार स्वर्गलोक या पृथ्वीलोक में पारिजात वृक्ष को सर्वोत्तम स्थान प्राप्त है। आयुर्वेद में परिजात के वृक्ष को हारसिंगार कहा जाता है तथा हारसिंगार अर्थात पारिजात के फूलों का लक्ष्मी व शिवपूजन में अत्यधिक महत्व है। पुराण प्रेम सुख सागर के अनुसार अज्ञातवास भोग रहे पाण्डव माता कुंती के साथ उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिला के गांव किंटूर में आए थे। जहां उन्होंने एक शिव मंदिर की स्थापना की ताकि उनकी माता अपनी इच्छानुसार पूजा अर्चना कर सकें। श्रीकृष्ण के आदेश पर कुंति हेतु पाण्डव सत्यभामा की वाटिका से परिजात वृक्ष को ले आए थे क्योंकि इस वृक्ष के पुष्पों से माता कुंति शिव पूजन करती थीं। 
हरिवंश पुराण के अनुसार पारिजात के वृक्ष को कल्पवृक्ष कहा गया है तथा इसकी उत्तपत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी। इस वृक्ष को देवराज इंद्र स्वर्गलोक ले गए थे। इसे छूने का अधिकार मात्र उर्वशी नामक अप्सरा को प्राप्त था, जिससे उर्वशी की सारी थकान दूर हो जाती थी। परिजात एकमात्र ऐसा वृक्ष है जिस पर बीज नहीं लगते व इसकी कलम बोने पर दूसरा वृक्ष नहीं लगता। इस अद्भुत वृक्ष पर पुष्प जरूर खिलते हैं लेकिन वे भी रात में तथा प्रातः होने पर सभी फूल मुरझा जाते हैं। इन फूलों को मूलतः लक्ष्मी पूजन हेतु उपयोग किया जाता है परंतु मात्र उन्हीं फूलों को उपयोग किया जाता है जो स्वयं टूटकर गिरे हों। 
◇ गौरव अवस्थी
     रायबरेली ( उप्र)


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