पश्चिमी सिद्धांतों से प्रभावित स्वदेशी विचारकों और पश्चिमी देशों के मीडिया द्वारा दानव जैसी छवि पेश करना - उपाली ओपराजिता

भारत और शेष विश्व शताब्दी में एक बार आने वाली वैश्विक महामारी, जो मानव जाति के इतिहास में सबसे दुखद और विनाशकारी घटना के रूप में सामने आयी है, का मुकाबला रहे हैं। इस साल फरवरी में ही दुनिया भर के विशेषज्ञों ने अशुभ भविष्यवाणियों को दरकिनार करते हुए महामारी की पहली लहर से समझदारी के साथ निपटने के लिए भारत की सराहना की थी। विभिन्न अफवाहों से अप्रभावित रहते हुए, भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, सराहना से संतुष्ट होकर नहीं बैठे और महामारी पर विशेष ध्यान देना जारी रखा। मार्च 2021 में, उन्होंने स्पष्ट रूप से भारत के 29 राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सात केंद्र शासित प्रदेशों से संभावित दूसरी लहर के बारे में सतर्क रहने का अनुरोध किया। जैसा डॉ फौसी ने उल्लेख किया है, भारत में महामारी की सुनामी जैसी दूसरी लहर का कोई भी सरकार अनुमान नहीं लगा सकती थी, जिसमें अब तक की सर्वाधिक तीव्रता और संक्रमित करने की क्षमता थी। दुनिया में किसी भी देश को, कभी भी, महामारी के ऐसे स्वरुप, इतने बड़े पैमाने, जटिलता और प्रभाव से निपटना नहीं पड़ा था। ऐसा लगता था कि कई हमलों का मुकाबला एक साथ करना पड़ रहा है। चीन के विपरीत, भारत एक लोकतंत्र है। देश में ग्रामीण-शहरी, केंद्र-राज्य और अन्य अंतर मौजूद हैं, लेकिन विपक्ष साथ आने के बजाय, राजनीतिक श्रेष्टता दिखाने में लिप्त है और इसलिए उनकी अनदेखी की जाती है। डॉ फौसी ने भारत के विकास के इस सबसे खतरनाक मोड़ पर एकजुट रहने और विभाजनकारी विचारों पर ध्यान ना देने के किये देशवासियों से अनुरोध किया है। 2020 में, जब कोरोनावायरस महामारी पहली बार फैली, तो भारत ने अमेरिका को दवाओं के कई खेप और बाद में उदारता की भावना दिखाते हुए 90 से अधिक देशों को वैक्सीन भेजे। अब, एक दानव जैसी दूसरी लहर भारत और इसकी आबादी, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के आकार से चार गुनी अधिक है, को अपनी चपेट में ले रही है। कुछ व्यक्तियों का मत है कि देश एक "बाधारहित जैव युद्ध" का सामना कर रहा है और इससे लोगों के स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा पर संकट पैदा हो गया है। पूरी दुनिया को भारत के प्रति सहानुभूति दिखानी चाहिए, क्योंकि ऐसा किसी भी देश के साथ हो सकता है और वर्तमान में, सर्वाधिक संपन्न देशों के साथ भी ऐसा हो रहा है। यूके, यूएसए, जापान और अन्य देश शुरुआत में ही भारत द्वारा उदारता की भावना के साथ किये गए कामों का मूल्य चुका रहे हैं। महामारी ने कुछ हद तक दुनिया के नेताओं को एकजुट किया है। यह देखते हुए कि इसका दायरा वैश्विक है, इसके लिए वैश्विक प्रतिक्रिया और सहयोग की आवश्यकता है। इससे कुछ भी कम पर्याप्त नहीं होगा। दुनिया की सबसे धनी अर्थव्यवस्था, संयुक्त राज्य अमेरिका भी कोरोनावायरस से लगभग लड़खड़ा गया था। इसके प्रमुख शहरों, विशेष रूप से न्यूयॉर्क में मरने वाले मरीजों की तस्वीरें मीडिया में दिखाई जाती थीं, लेकिन वे कभी भी डरावनी, निम्न दर्जे की और क्रूर नहीं थीं तथा मृतक और उनके शोकग्रस्त परिवारों के प्रति आवश्यक व अनिवार्य सम्मान दिखाया जाता था। जब भारत की बात आती है, तो आकलन करने व निष्कर्ष देने में गिद्ध जैसी दृष्टि के साथ इतनी जल्दबाज़ी क्यों? भारत ने अपेक्षाकृत कम मामलों और कम मौतों के साथ महामारी की पहली लहर से अपना बचाव किया था। केंद्र सरकार ने अप्रैल, 2020 में लॉकडाउन का आदेश दिया और कोविड -19 का सामना करने के लिए एक रणनीति अपनाई। ऐसा प्रतीत होता है कि यह रणनीति प्रभावी रही। महामारी की दूसरी लहर क्रूर है - वायरस अपने नए, परिवर्तित अवतार में अधिक ताकतवर है; लक्षण अलग-अलग हैं, सामान्य उपचारों से इसका इलाज नहीं हो सकता; शुरुआत में मृत्यु-दर विनाशकारी रूप से बहुत तेज होती है और ठीक होने के बाद भी कोविड -19 की कई जटिलताएं मौजूद रहती हैं। महामारी की दूसरी लहर के दौरान, भारत के पत्रकारों, स्व-नियुक्त टिप्पणीकारों, अभिनेताओं और अन्य तथाकथित विशेषज्ञों के एक समूह ने सरकार की निंदा की। यदि सरकार कार्य करती है, तो आलोचना की जाती है और अगर नहीं करती है, तो निंदा की जाती है। इन लोगों ने द्वेष और निर्दयता की भावना के साथ ट्वीट किये, जिनकी मूल भावना भारत सरकार, इसके नेतृत्व और देश की निंदा करने से प्रेरित थी। उन्होंने बेरहमी से एक व्यक्ति पर, सबसे बढ़कर, एक ऐसे व्यक्ति पर हमला किया, जिसने राजनेता की तरह भारत को अपनी पहली कठिन लहर के दौरान आगे बढ़ाया - प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। पीएम नरेन्द्र मोदी पर व्यक्तिगत रूप से हमला करने के लिए हर दिन संक्रीर्ण और अर्थहीन अभियान चलाया जा रहा है। ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर, आरोप-प्रत्यारोप कई गुना बढ़ गए हैं। पश्चिमी मीडिया भी भारत को ‘सभ्य बनाने की अपनी जिम्मेदारी’ के तहत देश की निंदा करने ने व्यस्त है। यह पश्चिमी सिद्धांतों से प्रभावित नए स्वदेशी विचारकों को नस्लवादी बयानबाजी और अपशब्दों के लिए एक मंच प्रदान करता है। यह भारत में शासन पर निर्णय पारित करता है, जो अच्छे समय में भी सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण है, और नियमित रूप से भारत की जमीनी वास्तविकताओं के बारे में दुनिया को गुमराह करता है, इसे हमारे उपनिवेशवादी पत्रकारों और भारतीय प्रवासी के कुछ समूहों से अत्यधिक मदद मिलती है। वे एक साथ मिलकर इटली स्थित ‘दानवों के पार्क’ की याद दिलाते हैं। फिर कुछ ऐसे पत्रकार हैं, जो श्मशान घाटों का दौरा करते हैं, वहां समय व्यतीत करते हैं, नाटकीयता बढ़ाते हैं और अंतिम संस्कार की चिता के साथ 'वीरता' का प्रसारण करते हैं। वे दुःखद शोक के समय में लोगों की निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। हिंदू अपने मृतकों को दफनाने के बजाय दाह संस्कार करते हैं, वे दिलों को भेदने वाले और डरावने चित्र प्रस्तुत करते हैं, ऐसा ही है ना? यह नैतिक रूप से अमान्य और अत्यंत निंदनीय है। मेरा विचार है कि यदि आप एक महामारी के बीच मदद नहीं कर सकते हैं, तो कम से कम नुकसान न पहुंचाएं और तिरस्कार का भाव ना रखें। आप आश्चर्य करते होंगे कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस विशेष ब्रांड के क्रूरता और विचारों की अंधभक्ति दिखाने वाले लोगों पर क्यों मोहित है। भारत, देश की सरकार तथा प्रधानमंत्री को एक घटनाक्रम के आधार पर और कट्टर लेंस के माध्यम से क्यों देखा जाता है, यह तो उनके लिए ही फिट बैठता है। भारत के वैक्सीन नेतृत्व को जनवरी-फरवरी 2021 में विश्व स्तर पर मान्यता मिली थी। भारत ने पहले ही अपने 200 मिलियन नागरिकों का टीकाकरण कर लिया है: कम संसाधनों के साथ परिवहन के बड़े पैमाने को देखते हुए यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। भारत या दुनिया के किसी भी देश के लिए यह असंभव है कि वह तुरंत और एक बार में अपनी 1.4 बिलियन की पूरी आबादी को कवर करने के लिए पर्याप्त वैक्सीन का उत्पादन और इन्हें सुरक्षित रखने की व्यवस्था कर सके। भारत ने एक टीकाकरण योजना शुरू की है, जो सितंबर तक अधिकांश आयु वर्ग को कवर करने में सफल होगी और यह 2021 के अंत तक वैक्सीन की 2.4 बिलियन खुराक होगी। भारत ने कोविड -19 के इलाज / उपचार के लिए नये तरीकों को भी लॉन्च किया है। केंद्र सरकार ने कड़ी मेहनत से काम किया है और बिना रुके ऑक्सीजन-निर्माण संयंत्रों को स्थापित करने के लिए ऑक्सीजन सांद्रता और अन्य आवश्यक उपकरण खरीदे हैं; भारतीय सशस्त्र बलों के समर्थन को सुनिश्चित किया है; फील्ड अस्पताल स्थापित किए हैं; सैकड़ों रेलवे कोच और तथा इनडोर स्टेडियमों को कोरोनावायरस रोगियों के लिए अस्पतालों के रूप में परिवर्तित किया है एवं सार्वजनिक-निजी भागीदारी के साथ एक वैश्विक महामारी से लड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। डॉ देवी शेट्टी, एक विश्व प्रसिद्ध कार्डियक सर्जन हैं और महामारी पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के टास्क फोर्स के प्रमुख हैं। वे कहते हैं, “हमारी सरकार ने एड़ी – चोटी का जोर लगा दिया है। अगर पूरा देश बीमार पड़ जाये, तो पूरी दुनिया में कोई भी अवसंरचना इसे संभाल नहीं सकती है।” कयामत को गलत साबित करते हुए, संक्रमण-दर और मृत्यु-दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है और नए मामलों की तुलना में ठीक होने वालों की संख्या बढ़ी है। भारतीय पत्रकार इस औपनिवेशिक मिथक को फिर से जीवित और कायम रखते हैं कि भारत क्रूर है, अनियंत्रित है, पथभ्रष्ट है, और अभी भी मध्य युग में रह रहा है। इन झूठों के अपराधी उपनिवेशवादी भारतीय भी हैं और कुछ कार्यकर्ता हैं, जो आत्मसात करने की लालसा रखते हैं, और अपने पिछले आकाओं और चीन जैसे नयी ताकतों के लिए शोकग्रस्त हैं। भारत के साथ लोकतंत्रों की एकजुटता बढाने बढाने के बजाय, वे इसे कमजोर करने का प्रयास करते हैं। यदि आपके पास कहने के लिए कुछ भी रचनात्मक नहीं है और कोई सहायता नहीं दे सकते हैं, तो विभाजनकारी विचारों से बचें। इस ऐतिहासिक मोड़ पर नकारात्मकता अनुचित है। जब लाखों भारतीय मौत के खतरे का सामना कर रहे हों, तो क्रूरता दिखाना, विद्वेष फैलाना या झूठ बोलना सभ्यता नहीं है। यदि आप मदद कर सकते हैं - और सभी जानते हैं कि हमारे पत्रकार और कार्यकर्ता के अच्छे संपर्क होते हैं – तो कृपया ऐसा करें। लेकिन अगर आप मदद नहीं कर सकते हैं, तो एक कमजोर भारत को नुकसान पहुंचाना बंद करें। एक महामारी में, यह एक नैतिक अनिवार्यता है। मैं उस दयालु और देखभाल करने वाले भारत से प्यार करती हूं, जिसे कोई भी पत्रकार, कार्यकर्ता या वायरस कभी नष्ट नहीं कर सकता। ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर मैथ्यू हेडन ने हाल ही में पीड़ा व्यक्त करते हुए सुंदर प्रतिक्रिया दी है: “यह वायरस के खतरनाक प्रसार से जूझ रहा है, विश्व मीडिया ने 1.4 बिलियन की विशाल आबादी वाले देश को लताड़ने में कोई समय नहीं गंवाया है, जहां विशाल संख्या ही किसी भी सार्वजनिक योजना के क्रियान्वयन और इसकी सफलता के लिए एक चुनौती पेश करती है। इस विशाल और विविधतापूर्ण देश को चलाने के लिए जिन नेताओं और सरकारी अधिकारियों को दायित्व सौंपा गया है, उनके लिए मेरे मन में हमेशा सर्वोच्च सम्मान रहा है। ” -उपाली ओपराजिता
(लेखिका कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय में एक विशिष्ट फेलो हैं और सार्वजनिक नीति, संचार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर विश्व के राजनेताओं को सलाह देती हैं।)

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